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सच्चे रिश्ते

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रिश्ते जो पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं अपने सपनों की सीढ़ी पर आपको आगे बढ़ाते हैं  अपनी हथेली की रेखाओं को आपकी किस्मत बनाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं बरसों बरस बातों के बीज तक नहीं पड़ते न विचारों के सूरज की किरणे उतरती मन आँगन अचानक एक दिन बूँद पटल पर आकर गिरी है फिर वही तरीन ठहाकों की गूँज जो सुनाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं माँ पुकारती नहीं और माँ स्वार्थी नहीं माँ अपने बच्चों को विस्तृत होता देखती है उन्हें संसार के मंच पर पुरस्कृत होता देखती है माँ के अपने अरमान बच्चों को पास नहीं बुलाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं पिता का ह्रदय चट्टान सा महान होता है अपने बच्चों के लिए वही जीवन की पहचान होता है अपने बच्चों को परीक्षित होकर गिरता उठता हुआ देखता है पिता अपने सपनो की आहुति बच्चों के जीवन-यज्ञ में चढ़ाते हैं नहीं ! ऐसे सच्चे रिश्ते पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं

ख़ुशी का पर्याय

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ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं  नहीं ग़म की कोई सच्चाई नहीं  भूल जाते हैं हम जब अपना घर  याद नहीं आती जब बिसरी डगर  खो जाती है ख़ुशी तब कहीं  जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं मूँद कर सपने, बूँद भर अपने  मिट्टी में बीज रखा, लगा है पनपने  फूट कर साँस लेगा  इस दुनिया से आस लेगा  खोजने लगेगा सबब यहीं  जी, ख़ुशी कोई पर्याय नहीं  बरसात में भीगकर, धूप में तपकर  फूलने लगा है.. फलने को तत्पर  फल वह जो देना है किसी और हाथ  साथ, जो अपना हो ... ना हो साथ  क्या फ़र्क़ पड़ता है कहीं  जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं हाल जकड़ जब, काल पकड़ लेगा  हर पल की जब मेरा खुदा ख़बर लेगा  सूखे कंठ से आह को नयी राह मिलेगी  रौशनी से भरी तरंगों की साह मिलेगी  नया नज़ारा नया आसमां, नयी ज़मीं  जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं

साँसें रहती हैं सदा

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वक़्त की धुंद में खो तो गए हो कहीं लेकिन मेरी हथेलियों में आज भी गर्माहट है तुम्हारे हाथों की थामा था हाथ, चले थे कुछ कदम साथ तुम्हारे साये से मिला था मेरा साया कभी मेरी आँखों की गहराईयों में देखा था कभी तुमने, मेरे ख्यालों को अपनी डायरी में सहेजा था कभी मिलना मुझसे आकर - तुम्हारी महक मेरे पास है कभी नहीं खोता कोई नहीं ले जाता सुनो ? ये कोई नहीं जानता - बस तुम्हारा और मेरा एहसास है मिलना मुझसे आकर - तुम्हारी महक मेरे पास है

तुम ही हो

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रहना ज़मीं पर, अभी यहीं पर, देगी इनाम ये कुदरत मगर लौटाना भी होगा तुम्हे यहीं सब, अभिमान की बीमारी से बचकर रहना सह नही पाओगे , इस बाढ़ में ढेह जाओगे, अपने जीवन के बाड़ बनाये रखना उस अनदेखी अनजानी लाठी से डर कर रहना जीवन है ये , इस जीवन के इस पार भी तुम हो, उस पार भी तुम ... सिर्फ तुम - कारण भी तुम हो ,परिणाम भी तुम ही, प्रगति भी तुम हो, विराम भी तुम ही

बैठक मेरी तुम्हारी

मैं दर दर भटका पाप पुन्य मेरी समझ रही , वही श्वेत शून्य  कब पहुंचे उस दर्जे , औकात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - द्रौपदी के जैसा शील न मुझमे  न शबरी जैसा सबर कहीं  हर संत भाव से दूर हूँ मैं कब संवरेगा दिन , और होगी उजियारी रात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - कलि मल कलेवर से सना हुआ , मैं हीन भावना से बना हुआ , मैं तुमसे मिलकर वरन शुद्ध हो मेरा जीवन रेखा के पथ निकले, ये जीवन  बारात मेरी - तो कहो .... कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?

छलकती हैं आँखें

इस खाली से मन के बादलों में जब तमन्नाओं का पानी भर आता है उन्हें पाने भर की चाह में जब भावनाओं का सैलाब उमड़ आता है तब ..छलकती हैं आँखें प्यासी आँखों के आगे छवि ख्वाबों की जब नाचने लगती है इस ज़मीन पर, तुम्हारे स्पर्श की भूख जब जागने लगती है हर आती सांस में तुम्हे महसूस करता हूँ और जाती हुई सांस तुम्हें पास पाता हूँ ओझल होते बिम्ब तुम्हारे , तनहा जब कर जाते हैं आँखें मूँद , जब हम मुट्ठी भींच कर रह जाते हैं तब .. छलकती हैं आँखें टूटता बिखरता संसार लगे , श्रम जप ताप सब बेकार लगें तमस विलीन जब जीवन हो , भावहीन जब ये मन हो बोझल से हों बोल सभी , सिसकती साँसों का पार न हो जब साथ हो , फिर भी बात न हो कभी बातें हो , कोई साथ न हो जब ख़्वाब तो हों , पर नींद नहीं न चैन का तकिया सोने को गुहार भीतर से फूट रही हो , हर आस हमारी टूट रही हो कंधा न मिले जब रोने को ...तब.. छलकती हैं आँखें बरसों पुराना रिश्ता जो इतिहास की गर्त में कहीं खो गया था .. जैसे जीवंत, हँसता खिलखिलाता एक पन्ना जीवन की किताब का गाँव के किसी खेत के पास खड़े पीपल के पेड़ की ठंडी छाँव तले , सो गया था उसी रिश...

लौट आओ

भूतों की भीड़ में भटकते भटकते मन थक न जाए, लौट आओ भविष्य के बहकावे में न आ जाना देखो मन दुःख न पाए , लौट आओ ऐ कर ! कल जो तुमने कर दिया था अब वो नित्य ठोस है क्यों रोते हो , उस पर, जो बीत गया क्यूँ कर उस पर अफ़सोस है पुराने ज़ख्मों को मत कुरेदो कहीं तन दर्द न पाए, लौट आओ रहो मेरे साथ , यहाँ , इस पल खिलो , खिलखिलाओ , बन चंचल है सपाट सा ललाट इस पल का अभी लिख दो कहानी अनकही स्वर्ण अतीत गढ़ लो तुम भी सपने अधूरे न हों अंत समय गुहार लगाता हूँ मैं तुम्हे सुनो , ग्रहण लग न जाये , लौट आओ

ज़िन्दगी दो प्याज़ा

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हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के आंसू टपकते रहे आँखों से हमारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो निगाह जो हमने डाली , दुनिया की थालिओं पर कोई सब्जी में खा रहा है , कोई यूँ ही चबा रहा है कोई परांठे में , रायते में , इसका स्वाद पा रहा है हो ढंग चाहे जो भी , है भोग सबका जारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो छोटे से टुकड़े में भी, है सार देखो कितना निष्कर्ष सौ निकलते हैं , कर विचार देखो जितना साँसों में महक , जीव्हा पे जायेका अपनी निशानी छोड़ना इसका है कायदा करते रहो मंजन , या खाओ सोंफ सुपारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो नीम्बू निचोड़ , प्याज़ के टुकड़ों पर और नमक छिड़ककर ज़रा सा कोई औरों से सीखता है कोई अपनी अक्ल लगता हर कोई, अपनी तरह सजाता अपने आप में हर किसीको मान्य है यहाँ है वही एक श्रेष्ठतम , है उसीमे होशियारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के ....

जैसे कभी नहीं थे - गीत

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हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे हँसते हैं रो रहे हैं , पल जैसे जैसे बीते खामोश लब हैं लेकिन , ये बोलती निगाहें पैरों के छाले रोयें , पत्थर भरी ये राहें खुशबू तो आ रही हैं , फूलों की भी कहीं से हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे चलते ही जा रहे हैं , फलते ही जा रहे हैं नज़रों में लेके मंजिल , बढ़ते ही जा रहे हैं और छोर डोर का है , जो अपनी ओर खींचे हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे

हिरास

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बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना बेबसी और लाचारी की लाठी हमें थमाए न बुढ़ापा आएना , बुढ़ापा आएना कभी नरम नरम कभी सख्त सख्त ये वक्त गुज़रता जाता है जाने अनजाने वो हथेली पर कुछ लिखता जाता है इन रेखाओं के चक्रव्यूह में हमको और फसाये न बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना मान किया न ध्यान दिया , कभी तुमने इस उपहार का कभी किश्तों का कभी रिश्तों का तुम्हे ध्यान था इस संसार का जो जन्मा है वो मिट के रहेगा , सबक तुम्हे सिखलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा कभी घुटनों में कभी टकनों में इस दर्द मरे का राग बुरा आलू गोभी में स्वाद नहीं लगता सरसों का साग बुरा छाती में कफ का घेरा है ये पल पल मुझे सताए न बुढ़ापा आये न ... बुढ़ापा आये न जब हरियाली भरे बाग़ में तेरे नाती पोते खेलेंगे तुझे छू छू कर भागेंगे तेरे हाथ से लाठी लेलेंगे अपने दिन तू भी याद करेगा देख उन्हें मुस्काएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा इन आती जाती साँसों की जब अवधि पूरी होएगी मन राम रमे , मुस्कान हो मुख पर दुनिया ओझल होएगी तब बदलेगा ये वस्त्र पुराना , वक्त तुझे नहलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा ...

परी के फन

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खुले परों सी परी बनी इस गली से , उस गली थिरकती पग पग पगली पगली सब की प्यारी लाडली जब ब्याही गयी तब टूटी रोयी आँखें बाबुल की थी नादाँ न समझी बदल रही है दुनिया अब चेहरे, दीवारें , दरवाज़े, ये आले ये देहरी, वो तोरण , वो छिटकी , वो रसोई पिछली बातें, सारी यादें, माँ की गोद, और बाबुल की बाहें, लगके रोली पीया की होली सब धुंआ धुंआ, ना संग न सहेली, अपने घर से दूर है अकेली नयी निगाहें , नयी हैं बातें चाह किसी और की , राह कोई और सारे सपने सोये, नहीं दीखता कोई ठौर साड़ी में दबे परी के फन, पग पहुंचे रसोई तक, और हाथों में बेलन नारी जो बंटती आई है अपार अब आँगन से देखती है चाँद की ओर आँखों में आँसू की लकीरों को लेकर बांधती दिल से मायके तक की डोर और जब चोट खाती हैं... निगाहें लौट आती हैं हक़ीकत की दस्तक डराती है कभी कभी ख़यालों के बादलों में सजाती है ख्व़ाब ख्व़ाब, जो अगली ही पलक बिखर जाते हैं ज़मीन तक नहीं गिरते , न जाने किधर जाते हैं

बतियाती डायरी

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If you cannot see the audio controls, listen/download the audio file here मेरे हाथों में मुस्कुराती है मुझसे बतियाती है डायरी पन्ना दर पन्ना सीखती रही पलटता हूँ , सबक याद दिलाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी जब पाता हूँ , खुद को , अंधेरों के साए में इस डायरी के पन्नों की महक लिया करता हूँ किसी उलझन से जूझता हुआ आहें भरता हूँ तब, दिलासा के दीप जलाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी चलता रहूँ, बढ़ता रहूँ गिरुं भी कभी , तो संभलता रहूँ पिता की भाँती अनुशासित करती कभी माँ बनकर समझाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी ग़मों का गुबार हो , ख़ुशी की बुहार हो ठहाकों की गूँज कभी, आसुओं से श्रृंगार हो कारी कमरी समान,हर पल को अपना जान मेरी भावनाओं का बोझ उठाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी मेरे हाथों में मुस्कुराती ...ये डायरी

कुछ सुनाओ

सुबह सवेरे दफ्तर जाने की होड़ में चमचमाते हुए महकते हुए हम घर से निकले कि पाया हमारा दो पहिया वाहन पिए हुए था मौन व्रत धारण किये हुए था करवट भी दिलवाई, कुछ असर न हुआ इस स्कूटर ने हमारी हाजरी बस स्टॉप पर लगवाई वहीं मिश्रा जी हमें नज़र आये कतार में आगे से दुसरे नंबर पर खड़े थे हमसे आ टकराए, पीछे मिलने चले आये क्या बात है शर्मा जी , आज बस स्टॉप पर खड़े हैं हम अपने स्कूटर की करतूत सुनाने ही वाले थे अपना बेसुरा राग इनके आगे गाने ही वाले थे मिश्रा जी ने हमें चाहत भरी नज़रों से देखा होठों पर खिंची एक लम्बी सी रेखा बत्तीसी संभाली , आवाज़ निकाली , बोले कुछ बोले तो क्या बोले ....कुछ सुनाओ ! हमने कुछ और बात निकाली , कुछ दूर निगाह डाली हमारी इक्यावन नंबर की बस आ रही थी हमने कहा मिश्रा जी , बस में आपको कुछ सुनाते हैं बात आगे बढाते हैं मिश्रा जी की आँखों में हमने राहत की रौशनी पाई जैसे आधे घंटे के टाइम पास का बल्ब जल गया हो भाई हमें जगह भी मिल गयी और हमारे पास की सीट खाली थी जी हाँ , यहीं पर काव्य रचना की प्रभात बेला सजने वाली थी कुछ अधिक नहीं बढ़ पाई वे दूसरी पंक्ति में ही मन्त्...

बढ़े चलो

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ये वृक्ष जो हो देखते विराट से खड़े हुए थे पौधे ये भी तो कभी समय लगा बड़े हुए हवाएं सनसनाएंगी लहरें ज़िद पे आएँगी बढ़े चलो चढ़े हुए चढ़े चलो अड़े हुए जो आँखों ने तुम्हारी देखा कौन समझेगा यहाँ तुम्हे पता हैं रास्ते और मंजिलें रखी कहाँ कदम चलेंगे और हाथ कर्म होगा तुम से ही गिरो अगर, डरो नहीं गिरे कई खड़े हुए जो हौंसला बुलंद हो आग जब प्रचंड हो न कोई रोक पायेगा विश्वास जब अखंड हो विश्वास हो खुदी पे और खुदा पे जो है देखता संभालता है वो तुम्हे हों नैन जब भरे हुए ये वृक्ष जो हो देखते विराट से खड़े हुए थे पौधे ये भी तो कभी समय लगा बड़े हुए

बुलबुला

पानी पे बना बुलबुला मुझको सिखा गया जीने की नयी राह ये मुझको दिखा गया पानी पे बना बुलबुला ... कुछ नहीं से कुछ बना फूला सीना गर्व से ताली बजी ...खुश हुआ तकते रहे सब उसे उसे बड़ा बन जाने पे, अभिमान आगया पानी पे बना बुलबुला ... एक शिलापट्ट पे बड़ा इतरा रहा था वो हवा के झोकों के संग नाच गा रहा था वो अब सागर के संग न रहने का उसने मन बना लिया पानी पे बना बुलबुला ... दो चार छोटे बुलबुलों को उसने आमंत्रण दिया उनका मत हासिल कर आन्दोलन किया उन बुलबुलों को इसने पाठ नया पढ़ा दिया पानी पे बना बुलबुला ... उन्मत्त हवा का झोंका सब को सुखा गया उस अभिमानी बुलबुले का नामोनिशान ना रहा उसका रहम-ओ-करम है आगे हम जो बढ़ते आये हैं चुनौतियों को पार कर चोटियाँ चढ़ते आये हैं अहम् ना आने पाए कभी , फार्मूला टिका गया पानी पे बना बुलबुला मुझको सिखा गया

हे परंपिता !

कल फिरसे भूख लगेगी मुझे कल फिरसे खाना मागुंगा कुछ ख्वाब मुकम्मल आज हुए कल और मुरादें मागुंगा जब आस बिखरकर टूटेगी कभी हाथ न कुछ भी आता दिखे जब मूँद के आँखें बैठुंगा और तुमसे होता नाता दिखे पिघलने को, मैं सँभलने को तब तेरी बाहें मागुंगा कुछ ख्वाब मुकम्मल आज हुए कल और मुरादें मागुंगा सपनों की लकीरें हाथ लगें जब आंसू ख़ुशी के आँख भरे जब कद ऊंचा सा लगता हो तारीफें दुनिया आन करे तुझसे ना लेश भी दूरी हो तब भी तेरी साह मैं मागुंगा कुछ ख्वाब मुकम्मल आज हुए कल और मुरादें मागुंगा कहते हैं तुझसे आये हैं तुझमें मिल जाना है हमको उस रोज़ दिखेगा नूर तेरा धुल जाना है तब इस तम को तब तक तेरे नाम की होती रहें ऐसी बरसातें मागुंगा कुछ ख्वाब मुकम्मल आज हुए कल और मुरादें मागुंगा

अनुकूलता

सवेरे जल्दी उठाना होता है मुझे गरम चाय का प्याला और नाश्ता अपनों का प्यार स्पर्श दुलार तैयार होकर दफ्तर तक समय पर पहुँचने का साफ़ रास्ता व्यस्त रहता हूँ मैं दिन भर दोपहर का खाना भी ज़रूरी है भूख जो लगती है दिन में पानी भी पीता हूँ प्यास जो लगती है शरीर स्वस्थ है मेरा सांस लेने को पर्यावरण भी स्वच्छ चाहिए आज़ाद समाज में रहता हूँ मैं सरकार भी इमानदार चाहिए कहीं भूख से व्याकुल सोता न हो कोई बच्चा खिलौने को रोता न हो गली में दीखते भिखमंगे न हों धर्म के नाम पर ये दंगे न हों जब तक कोई आपदा हमारे सर न हो कितने सुकून में जी रहे हैं कब एहसास होता है शाम होने लगी है फिर भूख लग आई है प्रभु कृपा से खाना तैयार मुझतक आ ही जाता है टी वी का कुछ मनोरंजन पाकर इस किताब का एक पन्ना पढ़कर अब नींद आने लगी है आज बाहर की हवा सर्द है पास ये कम्बल रख लेता हूँ इसे ओढ़ लेता हूँ अब ,नींद भी आ रही है सोना है अब, कल सवेरे जल्दी उठाना है मुझे.......

ज़िन्दगी

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हर नए मोड़ पर नयी बात सिखाती है ज़िन्दगी कुछ लोग आते हैं चले जाते हैं .. नए लोगों से तार्रुफ़ कराती है ज़िन्दगी वक्त रहते , सब कुछ बदल जाता है इस दिल का आइना दिखाती है ज़िन्दगी लव्जों में लहजा और जीने की तहजीब अपने ही अंदाज़ में बताती है ज़िन्दगी इश्क करना इस खुदा से और खुद से , बेखबर है इबादत ज़िन्दगी ये , एक छोटा सा सफ़र जिस खुदा ने तुझे इस ज़मीन पर बड़े नाज़ से तकसीम कर भेजा तुझे ईमान से उसके लिए कुछ कर गुज़र ख़याल रखना अपनों का , उन्हें आंच न आये कभी और सींचना अपने सपनो को, सूखने न पाएं कभी न उम्मीद हो किसी कर्म से न मांग हो तेरी कोई बिन मांगे ही कैसे कैसे तोहफे दे जाती है ज़िन्दगी हर नए मोड़ पर नयी बात सिखाती है ज़िन्दगी कुछ लोग आते हैं चले जाते हैं .. नए लोगों से तार्रुफ़ कराती है ज़िन्दगी