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न पाप हैं न पुण्य हैं

  न पाप हैं न पुण्य हैं  विचार जैसे शून्य हैं  गदर नहीं फिकर नहीं  डगर नहीं शहर नहीं  कहां से कब चला था मैं  कहां हूं अब खबर नहीं  मीलों दूर जन्म से  या पास हूं मैं मौत के  घेरते हैं क्यों मुझे  ये साये गहरे खौफ के  भार है शरीर का  मैं कांपता अधीर सा  हूं मैं भी जैसे मैं नहीं  आरंभ यह प्रलय नहीं  कैसे देखूं कुछ यहां  मैं हो रहा विलय यहीं  हवा में यूं लहरा रहा  रो रहा कराह रहा  न कोई मांग अब मेरी  न चित्त कुछ भी चाह रहा  यहां भी मैं वहां भी मैं  हूं कौन मैं न जानता  नदी हूं क्या जो बह रहा डर रहा हूं कह रहा खो रहा पहचान अब खुद से भी अंजान अब  बन रहा बिगड़ रहा  मोड़ और मरोड़ सा रौशनी की चौंध है  मुझ से जो निकल रही  है स्मृति मेरे ही जन्म की  उगल रही निगल रही  न पाप हैं न पुण्य है  विचार जैसे शून्य हैं नितिन (११.०३.२४)

संभव है

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उम्र नहीं हो

उम्र नहीं हो   लिबास नहीं   न वज़न तुम अपनी देह का   न रंग अपने बालों का   न गालों पर पड़ते गड्ढे हो  तुम न पहचान किसी के नेह का   वो किताबें जो तुम पढ़ते हो   जो शब्द ज़बान से गढ़ते हो   आवाज़ सुबह की अलसाई सी   मुस्कान चेहरे पर पिघलाई सी   वो हँसी के ठहाके कभी कभी   और वो आंसू की सिसक दबी दबी   कभी गीत जो खुले दिल गाते हो   या मन ही मन तुम बाजे बजाते हो   वो जगह जहाँ खुश रहते हो   वो लोग जिन्हें घर कहते हो   तुम्हारा विश्वास जिन चीज़ों में ज़ब्त है   और तुम्हारी चाहत जिन लोगों में सशक्त है   वो तस्वीरें जो तुम्हारे बैडरूम में टंगी हैं   तुम आस हो अपने भविष्य की   जिस पर तुम्हारे आखें लगी हैं  इतनी सुंदरता तुम्हारे भीतर है   फिर क्यों चिंता  क्यों इतनी फ़िकर है   न करो परिभाषित जीवन को   उन चीज़ों से ,  उन लोगों से   जो नहीं मिल पाए सींचन को  ...