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जनवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दराज़ में राखी चिट्ठी

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वह चिट्ठी जो तुम्हारे नाम मैंने लिखकर दराज़ में रख संभाली है तुम्हारे बारे में क्या सोचती हूँ हर बात लिख डाली है कभी दूँगी तुम्हे पढ़ने के लिए या नहीं हाँ मगर तुम्हारे लिए मेरे मन में प्रेम कभी कम न होगा कुछ और बातें जोड़ती रहूंगी उस चिट्ठी में जो मैंने तुम्हारे नाम लिखकर रख संभाली है दराज़ में पढ़ लेना तुम , कभी मेरी आँखों में तो कभी मेरी मुस्कुराते हुए चेहरे पर

अगर लौटा सको

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अगर लौटा सको तो छूटते अरमान लौटा दो  हैं आँखों से छलकते जो भरे अरमान लौटा दो  अगर मजबूर हो तुम और कुछ भी कर नहीं सकते  तो देखो मेरी आँखों में , मेरी मुस्कान लौटा दो  नितिन शर्मा 

लड़का अच्छा है !

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लड़का अच्छा है ! पलट के जवाब नहीं देता  कुछ भी कहलो हँसता रहता है  कभी रुआब नहीं दिखाता  चार बातें सूना दो फिर भी  हँसता रहता है  लड़का अच्छा है ! जो कह दो चुप चाप कर देता है  इससे किसी की चुगली भी करो तो  किसी से जा के नहीं कहता  चांटे लगा दो चार फिर भी  हँसता रहता है  लड़का अच्छा है ! इतना सीधा ? हाय राम ! ! तो कैसे कराते हो काम ? अजी कुछ मुश्किल नहीं !  तारीफें  करदो .. झूठी ही सही  कहने में क्या जाता है  किसने सुनी , किसने कही  देखना आँखों में चमक उसकी  तभी परोस देना दो काम  देगा नहीं कैसे अंजाम  न नुकर करे तो लगा देना दो चार  किसी से जाके कुछ नहीं कहेगा  सह लेगा अत्याचार  और ज़्यादा क्या होगा  मर गिरेगा कहीं  लेकिन किसी से कहेगा नहीं  सच ! लड़का अच्छा है 

दरारें

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  "दुर्ग में पड़ी दरारें  तूफ़ान का पानी  पसीजी दीवारें  भरी हर एक दरार फिर  सहेजा बुहारा  मैंने दोबारा  की मरम्मत , निखारा  अब नहीं खुलूँगा  अब ...  फिर कभी नहीं " - नितिन शर्मा 

वह गुलाबी पतंग

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  खूब शोर तमाशा हुआ दिन भर  छतों पर  किसी की पतंग कट रही थी  तो कोई औरों की  काट रहा था  कोई मूंगफली की चिक्की खा रहा था  तो कोइ तिल के लड्डू बाँट रहा था  फिरकिओं से धागे कम हो रहे थे  और पतंगों से दूरी बढ़ रही थी  उसी पतंग से फिर भेंट हो न हो-  अपने मांझे को कसौटी की धार पर आसमान - ए - जंग में  सभी चढ़ा रहे थे  दूसरों की पतंगों को निढाल होता देख  ख़ुशी से चीख चिल्ला रहे थे  बेशुमार पतंगें आसमान में  इठला रही थीं  फरफराती हुई मानो  एक दुसरे से बतिया रही थीं  दिन ढलने लगा  पतंगें उतरने लगी  उतरते उतरते जैसे  बीते दिन की उड़ान को  याद करने लगी  रात हो चली  मैं अपने कमरे की  खिड़की पर बैठा  चाय पीते हुए  वही आसमान निहार रहा था  कि एक पतंग की आह सुनाई दी  पड़ोस की दीवार पर  एक तार में फँसी  गुलाबी पतंग दिखाई दी  मैंने गौर से देखा  उसकी चोंच की किनोर  ज़ख़्मी थी और  यह जगह जगह से फटी हुई  वह पतंग अपने  ...

कोष बदल रहे हैं

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कोष बदल रहे हैं  मेरे दोष पिघल रहे हैं  कुछ कोष मेरे शरीर में  अभी अभी कह गए  अलविदा  ओह ! मुझे तो पता भी न चला  कुछ नए कोष  उपज गए हैं  परतें मेरे शरीर से  खिर गयीं  कुछ उम्र की  घड़ियाँ  चलते चलते  गिर गयीं  ओह !  मुझे तो पता भी न चला  अभी चेहरे पे लकीर हँसी की  और अब , नहीं थी  विचारों की लहर  कभी जाना पहचाना  अभी अजनबी-सा शहर  कुछ नए चेहरे  कुछ बिछड़ते  गिरते , उभरते , ठहरते  चेहरे  कुछ नए नकाब  तो चंद उतरते चेहरे  परिवर्तन है ,  शायद यही जीवन है  मैं अगर मैं ही रहूं  तो मौत है  मैं चढ़ता चलूँ  तो है ज़िंदगी  तू अगर तू ही रहे  तो मैं ख़्वाब देख रहा हूँ  तू मुझे सुधरने पे मजबूर कर दे  तो है बंदगी  कोष बदल रहे हैं  मेरे दोष पिघल रहे हैं  नितिन शर्मा - ०६/०१/२२