बैठक मेरी तुम्हारी
मैं दर दर भटका पाप पुन्य
मेरी समझ रही , वही श्वेत शून्य
कब पहुंचे उस दर्जे , औकात मेरी
कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?
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द्रौपदी के जैसा शील न मुझमे
न शबरी जैसा सबर कहीं
हर संत भाव से दूर हूँ मैं
कब संवरेगा दिन , और होगी उजियारी रात मेरी
कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?
कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?
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कलि मल कलेवर से सना हुआ , मैं
कलि मल कलेवर से सना हुआ , मैं
हीन भावना से बना हुआ , मैं
तुमसे मिलकर वरन शुद्ध हो मेरा
जीवन रेखा के पथ निकले, ये जीवन बारात मेरी
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तो कहो .... कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?
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