कुछ सुनाओ
सुबह सवेरे दफ्तर जाने की होड़ में
चमचमाते हुए महकते हुए हम घर से निकले
कि पाया हमारा दो पहिया वाहन पिए हुए था
मौन व्रत धारण किये हुए था
करवट भी दिलवाई, कुछ असर न हुआ
इस स्कूटर ने हमारी हाजरी
बस स्टॉप पर लगवाई
वहीं मिश्रा जी हमें नज़र आये
कतार में आगे से दुसरे नंबर पर खड़े थे
हमसे आ टकराए, पीछे मिलने चले आये
क्या बात है शर्मा जी , आज बस स्टॉप पर खड़े हैं
हम अपने स्कूटर की करतूत सुनाने ही वाले थे
अपना बेसुरा राग इनके आगे गाने ही वाले थे
मिश्रा जी ने हमें चाहत भरी नज़रों से देखा
होठों पर खिंची एक लम्बी सी रेखा
बत्तीसी संभाली , आवाज़ निकाली , बोले कुछ बोले
तो क्या बोले ....कुछ सुनाओ !
हमने कुछ और बात निकाली , कुछ दूर निगाह डाली
हमारी इक्यावन नंबर की बस आ रही थी
हमने कहा मिश्रा जी , बस में आपको कुछ सुनाते हैं
बात आगे बढाते हैं
मिश्रा जी की आँखों में हमने राहत की रौशनी पाई
जैसे आधे घंटे के टाइम पास का बल्ब जल गया हो भाई
हमें जगह भी मिल गयी और हमारे पास की सीट खाली थी
जी हाँ , यहीं पर काव्य रचना की प्रभात बेला सजने वाली थी
कुछ अधिक नहीं बढ़ पाई
वे दूसरी पंक्ति में ही मन्त्र मुग्ध होगये
मेरे कंधे पर उनका सर था
हमने देखा, मिश्रा जी तो सोगये
मैं तो कविताओं की सूची लिए मूड में आया था
अगले ही पल हमने मिश्रा जी का गाल थपथपाया था
मिश्रा जी , उठिए ! मेरी कविता अधूरी रह गयी
आप तो अभी से सोगये , ऐसा तो मेरी कविता क्या कह गयी
मिश्रा जी ने आँखें खोली
उत्साहित से थे
पूरी बस में नज़र घुमाई , मेरे चेहरे पे रुके
बोले , मैं कवि-सम्मलेन में था ...... मंच पर
कविता सुना रहा था , लय में गा रहा था
अपने दिल का हाल बताता हूँ, एक कविता आपको सुनाता हूँ
मिश्रा जी ने एक के बाद एक , ४ - ५ रचनायें परोस दीं
छठी में उनका फोन आया
हमने पुछा कौन आया
बोले मेरा फ्रेंड है - राय
मेरा स्टॉप अगया , मैं चलता हूँ ....बाय !
हम कविताओं की सूची लिए बैठे रहे
वो फोन टुनटुना गए
मेरी कविता सुनने की कह रहे थे
अपनी सुना गए !!
चमचमाते हुए महकते हुए हम घर से निकले
कि पाया हमारा दो पहिया वाहन पिए हुए था
मौन व्रत धारण किये हुए था
करवट भी दिलवाई, कुछ असर न हुआ
इस स्कूटर ने हमारी हाजरी
बस स्टॉप पर लगवाई
वहीं मिश्रा जी हमें नज़र आये
कतार में आगे से दुसरे नंबर पर खड़े थे
हमसे आ टकराए, पीछे मिलने चले आये
क्या बात है शर्मा जी , आज बस स्टॉप पर खड़े हैं
हम अपने स्कूटर की करतूत सुनाने ही वाले थे
अपना बेसुरा राग इनके आगे गाने ही वाले थे
मिश्रा जी ने हमें चाहत भरी नज़रों से देखा
होठों पर खिंची एक लम्बी सी रेखा
बत्तीसी संभाली , आवाज़ निकाली , बोले कुछ बोले
तो क्या बोले ....कुछ सुनाओ !
हमने कुछ और बात निकाली , कुछ दूर निगाह डाली
हमारी इक्यावन नंबर की बस आ रही थी
हमने कहा मिश्रा जी , बस में आपको कुछ सुनाते हैं
बात आगे बढाते हैं
मिश्रा जी की आँखों में हमने राहत की रौशनी पाई
जैसे आधे घंटे के टाइम पास का बल्ब जल गया हो भाई
हमें जगह भी मिल गयी और हमारे पास की सीट खाली थी
जी हाँ , यहीं पर काव्य रचना की प्रभात बेला सजने वाली थी
कुछ अधिक नहीं बढ़ पाई
वे दूसरी पंक्ति में ही मन्त्र मुग्ध होगये
मेरे कंधे पर उनका सर था
हमने देखा, मिश्रा जी तो सोगये
मैं तो कविताओं की सूची लिए मूड में आया था
अगले ही पल हमने मिश्रा जी का गाल थपथपाया था
मिश्रा जी , उठिए ! मेरी कविता अधूरी रह गयी
आप तो अभी से सोगये , ऐसा तो मेरी कविता क्या कह गयी
मिश्रा जी ने आँखें खोली
उत्साहित से थे
पूरी बस में नज़र घुमाई , मेरे चेहरे पे रुके
बोले , मैं कवि-सम्मलेन में था ...... मंच पर
कविता सुना रहा था , लय में गा रहा था
अपने दिल का हाल बताता हूँ, एक कविता आपको सुनाता हूँ
मिश्रा जी ने एक के बाद एक , ४ - ५ रचनायें परोस दीं
छठी में उनका फोन आया
हमने पुछा कौन आया
बोले मेरा फ्रेंड है - राय
मेरा स्टॉप अगया , मैं चलता हूँ ....बाय !
हम कविताओं की सूची लिए बैठे रहे
वो फोन टुनटुना गए
मेरी कविता सुनने की कह रहे थे
अपनी सुना गए !!
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