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अगर लौटा सको

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अगर लौटा सको तो छूटते अरमान लौटा दो  हैं आँखों से छलकते जो भरे अरमान लौटा दो  अगर मजबूर हो तुम और कुछ भी कर नहीं सकते  तो देखो मेरी आँखों में , मेरी मुस्कान लौटा दो  नितिन शर्मा 

सजाई है दुकां मिठाई के लिए

सजना है मुझे सजना के लिए - की धुन पर ---- सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ झिलमिल ये बलब जलाए दूँ   ख़ुशबू भरे फूल सजाए दूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ १ )   ( दुकान ये धो लूँ जरा घिस घिस के , भाग जागेंगे दीवाली में इसके ) - २ आँगन ये जरा बुहार लूँ   इस बार ना कोई उधार दूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ २ )   ( काजू पड़े खोए में तो बर्फ़ी निखरे , केसर पड़ती है तो जलेबी ये खिले ) - २ ये समोसे गरम उतार लूँ   चटनी इमली की नितार लूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ - नितिन शर्मा  

किसका अंत

ये दर्द कैसा था ? क्यूँ लोग रोने लगे   क्यूँ इच्छाएँ सब खो गयीं , सब रोग सोने लगे ?   ये चीख़ पुकार किसके लिए है कुछ तो बताओ   क्यूँ रो रहे हो ? यह  मदप्राय- सा कौन  लेटा   है बीच में ? मेरे ही कपड़े , मुझसा ही चेहरा   मुझ से ही नैन नक़्श, रंग गहुआं गहरा   मैं ?   क्या मेरे लिए रो रहे हो ? मैं यहीं   हूँ - यहीं ! क्यूँ उदास हो रहे हो   याद है न,   पुष्पा लाला का क़र्ज़ चुकाना है अभी   मुन्ना ! तुम्हें स्कूल में अव्वल आना है - इस बार भी   सुनो मुझे ! तुम सुनते क्यूँ नहीं ? ओह ! शायद साथ हमारा छूट गया , घड़ा मिट्टी का टूट गया   अब मैं वो नहीं रहा   जब से जन्मा था , तब से मैं वो था ही नहीं   मैं यही था , जो अब एहसास हो रहा है   आ - घर के कोने में बैठ जा यहाँ   अब तू आज़ाद है , क्यूँ उदास हो रहा है   हाँ वो चेहरा मेरा था मगर मैं व...

याद है न?

If you cannot see the audio controls, listen/download the audio file here अपना न मान लेना कुछ भी   जो हाथ में लिए बैठे हो ,  सब मेरा है ..  याद है न ? गाड़ियाँ ,  मकान,  ये सामान, ये रिश्ते,  सम्मान   इनमें लहरा तो रहे हो , बौरा न जाना   सब मेरा है ...  याद है न ? बीमारी में मेरा ख़याल है   तुम्हें ज़िंदगी से सवाल है   दुखों में मेरी ओर रूख   और सुख में मुझसे बेरुख़ी   ठहाके लगा कर हँसता हूँ   तुम्हारी नादानी पर .  मेरी मौजूदगी ,  याद है न ?  रूठते हो , मनाते हो   खीजते हो , सताते हो   इनको जिन्हें   जानकार कहते हो   इनको जिन्हें   सलाहकार कहते हो   तुम्हें आ आ कर सताएँगे   तुम सी गा गा कर सताएँगे   मगर मुझ में मगन रहकर , तुम इनसे परे रह पाओगे . मेरी सलाह ...  याद है न ? उलझना नहीं इन धागों ...

मृग तृष्णा

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If you cannot see the audio controls, listen/download the audio file here भगवान नहीं हूँ मैं , भूल कर बैठता हूँ विचारों के मंथन को , मुझ तक पहुँचते स्पंदन को वर्जित   कर न   पाया , कभी कभी उठते इंसान को , क्यूँकि मैं भगवान नहीं हूँ  ...        औरों से सुना करते थे , संतुलन की बातें   न साधु ही तर पाए , न विकृत आत्माएँ अब तक   जीवन को समझना कठिन ही सही   सभी प्रयत्नशील हैं यहाँ - कोई  ' है'   जो कभी तो   सुनेगा इस मानवीय क्रंदन को   क्यूँकि   मैं भगवान नहीं हूँ....   गिर गिर के सम्भलना प्रकृति ने सिखाया है   संभल कर आगे बढ़ पाया , कभी जीवन सजाया है   बरसों लगे पल पल , इसे हमने तराशा मगर   कभी खंडित , कभी दंडित होता हुआ नज़र आया है   क्यूँकि मैं भगवान नहीं हूँ...   मुझ तक ही फिर कर आते हुए ये जो कर्म हैं मेरे   ...