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तुम ही हो

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रहना ज़मीं पर, अभी यहीं पर, देगी इनाम ये कुदरत मगर लौटाना भी होगा तुम्हे यहीं सब, अभिमान की बीमारी से बचकर रहना सह नही पाओगे , इस बाढ़ में ढेह जाओगे, अपने जीवन के बाड़ बनाये रखना उस अनदेखी अनजानी लाठी से डर कर रहना जीवन है ये , इस जीवन के इस पार भी तुम हो, उस पार भी तुम ... सिर्फ तुम - कारण भी तुम हो ,परिणाम भी तुम ही, प्रगति भी तुम हो, विराम भी तुम ही

बैठक मेरी तुम्हारी

मैं दर दर भटका पाप पुन्य मेरी समझ रही , वही श्वेत शून्य  कब पहुंचे उस दर्जे , औकात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - द्रौपदी के जैसा शील न मुझमे  न शबरी जैसा सबर कहीं  हर संत भाव से दूर हूँ मैं कब संवरेगा दिन , और होगी उजियारी रात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - कलि मल कलेवर से सना हुआ , मैं हीन भावना से बना हुआ , मैं तुमसे मिलकर वरन शुद्ध हो मेरा जीवन रेखा के पथ निकले, ये जीवन  बारात मेरी - तो कहो .... कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?