परी के फन
खुले परों सी परी बनी
इस गली से , उस गली
थिरकती पग पग पगली पगली
सब की प्यारी लाडली
जब ब्याही गयी तब टूटी
रोयी आँखें बाबुल की
थी नादाँ न समझी
बदल रही है दुनिया अब
चेहरे, दीवारें , दरवाज़े, ये आले
ये देहरी, वो तोरण , वो छिटकी , वो रसोई
पिछली बातें, सारी यादें,
माँ की गोद,
और बाबुल की बाहें, लगके रोली
पीया की होली
सब धुंआ धुंआ, ना संग न सहेली,
अपने घर से दूर है अकेली
नयी निगाहें , नयी हैं बातें
चाह किसी और की , राह कोई और
सारे सपने सोये, नहीं दीखता कोई ठौर
साड़ी में दबे परी के फन,
पग पहुंचे रसोई तक, और हाथों में बेलन
नारी जो बंटती आई है अपार
अब आँगन से देखती है चाँद की ओर
आँखों में आँसू की लकीरों को लेकर
बांधती दिल से मायके तक की डोर
और जब चोट खाती हैं...
निगाहें लौट आती हैं
हक़ीकत की दस्तक डराती है कभी
कभी ख़यालों के बादलों में सजाती है ख्व़ाब
ख्व़ाब, जो अगली ही पलक बिखर जाते हैं
ज़मीन तक नहीं गिरते , न जाने किधर जाते हैं

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