अनुकूलता

सवेरे जल्दी उठाना होता है मुझे
गरम चाय का प्याला और नाश्ता
अपनों का प्यार स्पर्श दुलार
तैयार होकर दफ्तर तक
समय पर पहुँचने का साफ़ रास्ता
व्यस्त रहता हूँ मैं दिन भर
दोपहर का खाना भी ज़रूरी है
भूख जो लगती है
दिन में पानी भी पीता हूँ
प्यास जो लगती है
शरीर स्वस्थ है मेरा
सांस लेने को पर्यावरण भी स्वच्छ चाहिए
आज़ाद समाज में रहता हूँ मैं
सरकार भी इमानदार चाहिए
कहीं भूख से व्याकुल सोता न हो
कोई बच्चा खिलौने को रोता न हो
गली में दीखते भिखमंगे न हों
धर्म के नाम पर ये दंगे न हों
जब तक कोई आपदा हमारे सर न हो
कितने सुकून में जी रहे हैं
कब एहसास होता है
शाम होने लगी है
फिर भूख लग आई है
प्रभु कृपा से
खाना तैयार मुझतक आ ही जाता है
टी वी का कुछ मनोरंजन पाकर
इस किताब का एक पन्ना पढ़कर
अब नींद आने लगी है
आज बाहर की हवा सर्द है
पास ये कम्बल रख लेता हूँ
इसे ओढ़ लेता हूँ अब ,नींद भी आ रही है
सोना है अब, कल सवेरे जल्दी उठाना है मुझे.......

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