ख़ुशी का पर्याय
ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं नहीं ग़म की कोई सच्चाई नहीं भूल जाते हैं हम जब अपना घर याद नहीं आती जब बिसरी डगर खो जाती है ख़ुशी तब कहीं जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं मूँद कर सपने, बूँद भर अपने मिट्टी में बीज रखा, लगा है पनपने फूट कर साँस लेगा इस दुनिया से आस लेगा खोजने लगेगा सबब यहीं जी, ख़ुशी कोई पर्याय नहीं बरसात में भीगकर, धूप में तपकर फूलने लगा है.. फलने को तत्पर फल वह जो देना है किसी और हाथ साथ, जो अपना हो ... ना हो साथ क्या फ़र्क़ पड़ता है कहीं जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं हाल जकड़ जब, काल पकड़ लेगा हर पल की जब मेरा खुदा ख़बर लेगा सूखे कंठ से आह को नयी राह मिलेगी रौशनी से भरी तरंगों की साह मिलेगी नया नज़ारा नया आसमां, नयी ज़मीं जी, ख़ुशी का कोई पर्याय नहीं