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सजाई है दुकां मिठाई के लिए

सजना है मुझे सजना के लिए - की धुन पर ---- सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ झिलमिल ये बलब जलाए दूँ   ख़ुशबू भरे फूल सजाए दूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ १ )   ( दुकान ये धो लूँ जरा घिस घिस के , भाग जागेंगे दीवाली में इसके ) - २ आँगन ये जरा बुहार लूँ   इस बार ना कोई उधार दूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ २ )   ( काजू पड़े खोए में तो बर्फ़ी निखरे , केसर पड़ती है तो जलेबी ये खिले ) - २ ये समोसे गरम उतार लूँ   चटनी इमली की नितार लूँ   के सजाई है दुकां मिठाई के लिए - २ - नितिन शर्मा  

भजन : तुम बिन मेरा नहीं अपना कोई और

तुम बिन मेरा नहीं अपना कोई और   तुमहयी मेरे ठाकुर तुमहयी मेरे ठौर   किस को मनाऊँ मैं किस को रिझाऊँ   किस से करूँ है ज़िद , है किस पर ज़ोर   तुमहयी मेरे ठाकुर तुमहयी मेरे ठौर   इत पकड़ूँ उत सरपट भागे   मन प्रभु तुम बिन थिरकत लागे   लगती लगाम जब रौशनी सी डोर   तुमहयी मेरे ठाकुर तुमहयी मेरे ठौर   तुम बिन मेरा नहीं अपना कोई और   तुमहयी मेरे ठाकुर तुमहयी मेरे ठौर  

एक नया आसमां

हम तुम चले हैं मिलके , बनाने एक नया ही जहाँ   एक नया आसमा   झूमे सभी गाएँ सभी , जीवन में मेरे जी   झूमे सभी गाएँ सभी ,   यादों की हवन बरातें , और खिलखिलाती हों बातें   बादल हों सूखे या भीगे कभी   ख़ुशियों की हों बरसातें   देखें यहाँ से वहाँ   एक नया आसमान   हो आज अपना जैसे साँवरा   कहे तो के ये जहाँ बाँवर   हम अपनी तक़दीर गढ़ते रहें   मंज़िल दर मंज़िल यूँ ही बढ़ते रहें   जानें हम जाना कहाँ   एक नया आसमा  

चाँद सबका अपना अपना

चाँद सबका अपना अपना   मेरा चाँद तेरा नहीं   तेरा चाँद मेरा नहीं   चाँद है , सबका अपना अपना ! कभी बोलता कुछ भी नहीं   फिर भी बातें बहुत करता है   वह चाँद जो दूर आसमां पे सजता है - तो क्या है भाषा   इस चाँद की   जिसने बिना टिकट कटाए   सदियाँ नाप ली   मेरे आंसुओं में बहता है   यह चाँद मेरी मुस्कान पे रहता है   मेरी त्योहरियों पे दिखता है   दिल की ज़बान कहता है   रात की गहराइयों में   कभी सुबह की अंगड़ाइयों में   बुलाता है मुझे यह चाँद   मेरी उदासीन तनहाइयों में   " आओ पास ज़रा , बात करें   कहो कैसे हो , जज़्बात धरें " दिल की धड़कन सम्भल जाती है   चाँद आता है जब यूँ साथ मेरे   तेरा चाँद क्या ऐसा है ? बिलकुल मेरे चाँद के जैसा है ? हाँ , होता है - चाँद सबका अपना अपना   तेरा चाँद मेरा नहीं - मेरा चाँद तेरा नहीं   चाँद ? स...

समय रहते

लड़ते भिड़ते , कुढ़ते चिढ़ते   उम्र बीतने लगती है   क्यूँ कर रूठे बैठे अहम की आग जीतने लगती है   किस कारण , आँखें फेर रहे   जब सोच जागने लगती है   तब देर बहुत हो जाती है   जब रूह भाग निकलती है   ना आँखें देख पाती फिर उनको ना कहने को लफ़्ज़ मिल पाएँगे   तुम भी हो मेहमान यहाँ   जिनसे रूठे हो , वे भी जाएँगे   मान जाओ या मना लो उनको   जो पास हैं फिर भी मीलों दूर   कह लो सुन लो मन की अपनी   ढहती मिट्टी क्यूँ मगरूर   नितिन शर्मा