तुम ही हो

रहना ज़मीं पर, अभी यहीं पर,
देगी इनाम ये कुदरत मगर
लौटाना भी होगा तुम्हे यहीं सब,
अभिमान की बीमारी से बचकर रहना
सह नही पाओगे , इस बाढ़ में ढेह जाओगे,
अपने जीवन के बाड़ बनाये रखना
उस अनदेखी अनजानी लाठी से डर कर रहना
जीवन है ये ,
इस जीवन के इस पार भी तुम हो,
उस पार भी तुम ... सिर्फ तुम
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कारण भी तुम हो ,परिणाम भी तुम ही,
प्रगति भी तुम हो, विराम भी तुम ही
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