ज़िन्दगी दो प्याज़ा
हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के
आंसू टपकते रहे आँखों से हमारी
ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो
निगाह जो हमने डाली , दुनिया की थालिओं पर
कोई सब्जी में खा रहा है , कोई यूँ ही चबा रहा है
कोई परांठे में , रायते में , इसका स्वाद पा रहा है
हो ढंग चाहे जो भी , है भोग सबका जारी
ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो
छोटे से टुकड़े में भी, है सार देखो कितना
निष्कर्ष सौ निकलते हैं , कर विचार देखो जितना
साँसों में महक , जीव्हा पे जायेका
अपनी निशानी छोड़ना इसका है कायदा
करते रहो मंजन , या खाओ सोंफ सुपारी
ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो
नीम्बू निचोड़ , प्याज़ के टुकड़ों पर
और नमक छिड़ककर ज़रा सा
कोई औरों से सीखता है
कोई अपनी अक्ल लगता
हर कोई, अपनी तरह सजाता
अपने आप में हर किसीको मान्य है यहाँ
है वही एक श्रेष्ठतम , है उसीमे होशियारी
ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो
हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के ....

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