Lockdown
स्पर्श दोस्त का भूल रहा हुँ
श्वेत सपन-सा झूल रहा हुँ
देगी कब यारी द्वारे दस्तक
इंतज़ार यह आख़िर कब तक
नानी के घर जाना होता
सबसे मिलना मिलाना होता
गर्मी की छुट्टी कैसी ये आयी
अपने ही घर में बैठें कब तक
इंतज़ार यह आख़िर कब तक
खेल खिलौने कब तक खेलें
इंटर्नेट विज्ञापन झेलें
खबरों में क्या झूठा क्या सच्चा
किसकी मानें कौन है रक्षक
इंतज़ार यह आख़िर कब तक
कभी ये गहरी धूंद छटेगी
आँखों से यह छटा हटेगी
सब नया-नया नज़ारा होगा
आएगा याद जो देखा अब तक
पर
इंतज़ार ये आख़िर कब तक
© नितिन शर्मा
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