पापा

आप ही के कहे शब्दों की ऊँगली थामे , 
मैं ज़मीन पर कदम जमाता चल रहा हु
नहीं भूला मैं अपना बचपन आज भी 

मुझे निर्देशित करती है , अनुशासित करती 
मेरा नाम लेती हुई आवाज़ आपकी 
जाने कहाँ से सुन पा रहा हु आपको 
नहीं भूला मैं अपना बचपन आज भी

आपके होने का आज भी मुहताज हूँ 
कैसे कहूँ जो हूँ मैं आप ही से आज हूँ
गिनती से परे है क्या क्या किया आपने  
नहीं भूला मैं अपना बचपन आज भी

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