समय रहते
लड़ते भिड़ते,कुढ़ते चिढ़ते
उम्र बीतने लगती है
क्यूँ कर रूठे बैठे
अहम की आग जीतने लगती है
किस कारण, आँखें फेर रहे
जब सोच जागने लगती है
तब देर बहुत हो जाती है
जब रूह भाग निकलती है
ना आँखें देख पाती फिर उनको
ना कहने को लफ़्ज़ मिल पाएँगे
तुम भी हो मेहमान यहाँ
जिनसे रूठे हो, वे भी जाएँगे
मान जाओ या मना लो उनको
जो पास हैं फिर भी मीलों दूर
कह लो सुन लो मन की अपनी
ढहती मिट्टी क्यूँ मगरूर
नितिन शर्मा
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