संदेश

लौट आओ

भूतों की भीड़ में भटकते भटकते मन थक न जाए, लौट आओ भविष्य के बहकावे में न आ जाना देखो मन दुःख न पाए , लौट आओ ऐ कर ! कल जो तुमने कर दिया था अब वो नित्य ठोस है क्यों रोते हो , उस पर, जो बीत गया क्यूँ कर उस पर अफ़सोस है पुराने ज़ख्मों को मत कुरेदो कहीं तन दर्द न पाए, लौट आओ रहो मेरे साथ , यहाँ , इस पल खिलो , खिलखिलाओ , बन चंचल है सपाट सा ललाट इस पल का अभी लिख दो कहानी अनकही स्वर्ण अतीत गढ़ लो तुम भी सपने अधूरे न हों अंत समय गुहार लगाता हूँ मैं तुम्हे सुनो , ग्रहण लग न जाये , लौट आओ

ज़िन्दगी दो प्याज़ा

चित्र
हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के आंसू टपकते रहे आँखों से हमारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो निगाह जो हमने डाली , दुनिया की थालिओं पर कोई सब्जी में खा रहा है , कोई यूँ ही चबा रहा है कोई परांठे में , रायते में , इसका स्वाद पा रहा है हो ढंग चाहे जो भी , है भोग सबका जारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो छोटे से टुकड़े में भी, है सार देखो कितना निष्कर्ष सौ निकलते हैं , कर विचार देखो जितना साँसों में महक , जीव्हा पे जायेका अपनी निशानी छोड़ना इसका है कायदा करते रहो मंजन , या खाओ सोंफ सुपारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो नीम्बू निचोड़ , प्याज़ के टुकड़ों पर और नमक छिड़ककर ज़रा सा कोई औरों से सीखता है कोई अपनी अक्ल लगता हर कोई, अपनी तरह सजाता अपने आप में हर किसीको मान्य है यहाँ है वही एक श्रेष्ठतम , है उसीमे होशियारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के ....

जैसे कभी नहीं थे - गीत

चित्र
हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे हँसते हैं रो रहे हैं , पल जैसे जैसे बीते खामोश लब हैं लेकिन , ये बोलती निगाहें पैरों के छाले रोयें , पत्थर भरी ये राहें खुशबू तो आ रही हैं , फूलों की भी कहीं से हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे चलते ही जा रहे हैं , फलते ही जा रहे हैं नज़रों में लेके मंजिल , बढ़ते ही जा रहे हैं और छोर डोर का है , जो अपनी ओर खींचे हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे

हिरास

चित्र
बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना बेबसी और लाचारी की लाठी हमें थमाए न बुढ़ापा आएना , बुढ़ापा आएना कभी नरम नरम कभी सख्त सख्त ये वक्त गुज़रता जाता है जाने अनजाने वो हथेली पर कुछ लिखता जाता है इन रेखाओं के चक्रव्यूह में हमको और फसाये न बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना मान किया न ध्यान दिया , कभी तुमने इस उपहार का कभी किश्तों का कभी रिश्तों का तुम्हे ध्यान था इस संसार का जो जन्मा है वो मिट के रहेगा , सबक तुम्हे सिखलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा कभी घुटनों में कभी टकनों में इस दर्द मरे का राग बुरा आलू गोभी में स्वाद नहीं लगता सरसों का साग बुरा छाती में कफ का घेरा है ये पल पल मुझे सताए न बुढ़ापा आये न ... बुढ़ापा आये न जब हरियाली भरे बाग़ में तेरे नाती पोते खेलेंगे तुझे छू छू कर भागेंगे तेरे हाथ से लाठी लेलेंगे अपने दिन तू भी याद करेगा देख उन्हें मुस्काएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा इन आती जाती साँसों की जब अवधि पूरी होएगी मन राम रमे , मुस्कान हो मुख पर दुनिया ओझल होएगी तब बदलेगा ये वस्त्र पुराना , वक्त तुझे नहलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा ...

परी के फन

चित्र
खुले परों सी परी बनी इस गली से , उस गली थिरकती पग पग पगली पगली सब की प्यारी लाडली जब ब्याही गयी तब टूटी रोयी आँखें बाबुल की थी नादाँ न समझी बदल रही है दुनिया अब चेहरे, दीवारें , दरवाज़े, ये आले ये देहरी, वो तोरण , वो छिटकी , वो रसोई पिछली बातें, सारी यादें, माँ की गोद, और बाबुल की बाहें, लगके रोली पीया की होली सब धुंआ धुंआ, ना संग न सहेली, अपने घर से दूर है अकेली नयी निगाहें , नयी हैं बातें चाह किसी और की , राह कोई और सारे सपने सोये, नहीं दीखता कोई ठौर साड़ी में दबे परी के फन, पग पहुंचे रसोई तक, और हाथों में बेलन नारी जो बंटती आई है अपार अब आँगन से देखती है चाँद की ओर आँखों में आँसू की लकीरों को लेकर बांधती दिल से मायके तक की डोर और जब चोट खाती हैं... निगाहें लौट आती हैं हक़ीकत की दस्तक डराती है कभी कभी ख़यालों के बादलों में सजाती है ख्व़ाब ख्व़ाब, जो अगली ही पलक बिखर जाते हैं ज़मीन तक नहीं गिरते , न जाने किधर जाते हैं

बतियाती डायरी

चित्र
If you cannot see the audio controls, listen/download the audio file here मेरे हाथों में मुस्कुराती है मुझसे बतियाती है डायरी पन्ना दर पन्ना सीखती रही पलटता हूँ , सबक याद दिलाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी जब पाता हूँ , खुद को , अंधेरों के साए में इस डायरी के पन्नों की महक लिया करता हूँ किसी उलझन से जूझता हुआ आहें भरता हूँ तब, दिलासा के दीप जलाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी चलता रहूँ, बढ़ता रहूँ गिरुं भी कभी , तो संभलता रहूँ पिता की भाँती अनुशासित करती कभी माँ बनकर समझाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी ग़मों का गुबार हो , ख़ुशी की बुहार हो ठहाकों की गूँज कभी, आसुओं से श्रृंगार हो कारी कमरी समान,हर पल को अपना जान मेरी भावनाओं का बोझ उठाती है डायरी हाँ मुझसे बतियाती है डायरी मेरे हाथों में मुस्कुराती ...ये डायरी

कुछ सुनाओ

सुबह सवेरे दफ्तर जाने की होड़ में चमचमाते हुए महकते हुए हम घर से निकले कि पाया हमारा दो पहिया वाहन पिए हुए था मौन व्रत धारण किये हुए था करवट भी दिलवाई, कुछ असर न हुआ इस स्कूटर ने हमारी हाजरी बस स्टॉप पर लगवाई वहीं मिश्रा जी हमें नज़र आये कतार में आगे से दुसरे नंबर पर खड़े थे हमसे आ टकराए, पीछे मिलने चले आये क्या बात है शर्मा जी , आज बस स्टॉप पर खड़े हैं हम अपने स्कूटर की करतूत सुनाने ही वाले थे अपना बेसुरा राग इनके आगे गाने ही वाले थे मिश्रा जी ने हमें चाहत भरी नज़रों से देखा होठों पर खिंची एक लम्बी सी रेखा बत्तीसी संभाली , आवाज़ निकाली , बोले कुछ बोले तो क्या बोले ....कुछ सुनाओ ! हमने कुछ और बात निकाली , कुछ दूर निगाह डाली हमारी इक्यावन नंबर की बस आ रही थी हमने कहा मिश्रा जी , बस में आपको कुछ सुनाते हैं बात आगे बढाते हैं मिश्रा जी की आँखों में हमने राहत की रौशनी पाई जैसे आधे घंटे के टाइम पास का बल्ब जल गया हो भाई हमें जगह भी मिल गयी और हमारे पास की सीट खाली थी जी हाँ , यहीं पर काव्य रचना की प्रभात बेला सजने वाली थी कुछ अधिक नहीं बढ़ पाई वे दूसरी पंक्ति में ही मन्त्...