इस खाली से मन के बादलों में जब तमन्नाओं का पानी भर आता है उन्हें पाने भर की चाह में जब भावनाओं का सैलाब उमड़ आता है तब ..छलकती हैं आँखें प्यासी आँखों के आगे छवि ख्वाबों की जब नाचने लगती है इस ज़मीन पर, तुम्हारे स्पर्श की भूख जब जागने लगती है हर आती सांस में तुम्हे महसूस करता हूँ और जाती हुई सांस तुम्हें पास पाता हूँ ओझल होते बिम्ब तुम्हारे , तनहा जब कर जाते हैं आँखें मूँद , जब हम मुट्ठी भींच कर रह जाते हैं तब .. छलकती हैं आँखें टूटता बिखरता संसार लगे , श्रम जप ताप सब बेकार लगें तमस विलीन जब जीवन हो , भावहीन जब ये मन हो बोझल से हों बोल सभी , सिसकती साँसों का पार न हो जब साथ हो , फिर भी बात न हो कभी बातें हो , कोई साथ न हो जब ख़्वाब तो हों , पर नींद नहीं न चैन का तकिया सोने को गुहार भीतर से फूट रही हो , हर आस हमारी टूट रही हो कंधा न मिले जब रोने को ...तब.. छलकती हैं आँखें बरसों पुराना रिश्ता जो इतिहास की गर्त में कहीं खो गया था .. जैसे जीवंत, हँसता खिलखिलाता एक पन्ना जीवन की किताब का गाँव के किसी खेत के पास खड़े पीपल के पेड़ की ठंडी छाँव तले , सो गया था उसी रिश...