संदेश

तुम ही हो

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रहना ज़मीं पर, अभी यहीं पर, देगी इनाम ये कुदरत मगर लौटाना भी होगा तुम्हे यहीं सब, अभिमान की बीमारी से बचकर रहना सह नही पाओगे , इस बाढ़ में ढेह जाओगे, अपने जीवन के बाड़ बनाये रखना उस अनदेखी अनजानी लाठी से डर कर रहना जीवन है ये , इस जीवन के इस पार भी तुम हो, उस पार भी तुम ... सिर्फ तुम - कारण भी तुम हो ,परिणाम भी तुम ही, प्रगति भी तुम हो, विराम भी तुम ही

बैठक मेरी तुम्हारी

मैं दर दर भटका पाप पुन्य मेरी समझ रही , वही श्वेत शून्य  कब पहुंचे उस दर्जे , औकात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - द्रौपदी के जैसा शील न मुझमे  न शबरी जैसा सबर कहीं  हर संत भाव से दूर हूँ मैं कब संवरेगा दिन , और होगी उजियारी रात मेरी कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ? - कलि मल कलेवर से सना हुआ , मैं हीन भावना से बना हुआ , मैं तुमसे मिलकर वरन शुद्ध हो मेरा जीवन रेखा के पथ निकले, ये जीवन  बारात मेरी - तो कहो .... कब हो सकती है तुमसे बात मेरी ?

छलकती हैं आँखें

इस खाली से मन के बादलों में जब तमन्नाओं का पानी भर आता है उन्हें पाने भर की चाह में जब भावनाओं का सैलाब उमड़ आता है तब ..छलकती हैं आँखें प्यासी आँखों के आगे छवि ख्वाबों की जब नाचने लगती है इस ज़मीन पर, तुम्हारे स्पर्श की भूख जब जागने लगती है हर आती सांस में तुम्हे महसूस करता हूँ और जाती हुई सांस तुम्हें पास पाता हूँ ओझल होते बिम्ब तुम्हारे , तनहा जब कर जाते हैं आँखें मूँद , जब हम मुट्ठी भींच कर रह जाते हैं तब .. छलकती हैं आँखें टूटता बिखरता संसार लगे , श्रम जप ताप सब बेकार लगें तमस विलीन जब जीवन हो , भावहीन जब ये मन हो बोझल से हों बोल सभी , सिसकती साँसों का पार न हो जब साथ हो , फिर भी बात न हो कभी बातें हो , कोई साथ न हो जब ख़्वाब तो हों , पर नींद नहीं न चैन का तकिया सोने को गुहार भीतर से फूट रही हो , हर आस हमारी टूट रही हो कंधा न मिले जब रोने को ...तब.. छलकती हैं आँखें बरसों पुराना रिश्ता जो इतिहास की गर्त में कहीं खो गया था .. जैसे जीवंत, हँसता खिलखिलाता एक पन्ना जीवन की किताब का गाँव के किसी खेत के पास खड़े पीपल के पेड़ की ठंडी छाँव तले , सो गया था उसी रिश...

लौट आओ

भूतों की भीड़ में भटकते भटकते मन थक न जाए, लौट आओ भविष्य के बहकावे में न आ जाना देखो मन दुःख न पाए , लौट आओ ऐ कर ! कल जो तुमने कर दिया था अब वो नित्य ठोस है क्यों रोते हो , उस पर, जो बीत गया क्यूँ कर उस पर अफ़सोस है पुराने ज़ख्मों को मत कुरेदो कहीं तन दर्द न पाए, लौट आओ रहो मेरे साथ , यहाँ , इस पल खिलो , खिलखिलाओ , बन चंचल है सपाट सा ललाट इस पल का अभी लिख दो कहानी अनकही स्वर्ण अतीत गढ़ लो तुम भी सपने अधूरे न हों अंत समय गुहार लगाता हूँ मैं तुम्हे सुनो , ग्रहण लग न जाये , लौट आओ

ज़िन्दगी दो प्याज़ा

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हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के आंसू टपकते रहे आँखों से हमारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो निगाह जो हमने डाली , दुनिया की थालिओं पर कोई सब्जी में खा रहा है , कोई यूँ ही चबा रहा है कोई परांठे में , रायते में , इसका स्वाद पा रहा है हो ढंग चाहे जो भी , है भोग सबका जारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो छोटे से टुकड़े में भी, है सार देखो कितना निष्कर्ष सौ निकलते हैं , कर विचार देखो जितना साँसों में महक , जीव्हा पे जायेका अपनी निशानी छोड़ना इसका है कायदा करते रहो मंजन , या खाओ सोंफ सुपारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो नीम्बू निचोड़ , प्याज़ के टुकड़ों पर और नमक छिड़ककर ज़रा सा कोई औरों से सीखता है कोई अपनी अक्ल लगता हर कोई, अपनी तरह सजाता अपने आप में हर किसीको मान्य है यहाँ है वही एक श्रेष्ठतम , है उसीमे होशियारी ज़िन्दगी जैसे प्याज़ हो हम छीलते गए वरक ज़िन्दगी के ....

जैसे कभी नहीं थे - गीत

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हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे हँसते हैं रो रहे हैं , पल जैसे जैसे बीते खामोश लब हैं लेकिन , ये बोलती निगाहें पैरों के छाले रोयें , पत्थर भरी ये राहें खुशबू तो आ रही हैं , फूलों की भी कहीं से हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे चलते ही जा रहे हैं , फलते ही जा रहे हैं नज़रों में लेके मंजिल , बढ़ते ही जा रहे हैं और छोर डोर का है , जो अपनी ओर खींचे हम ऐसे हो रहे हैं , जैसे कभी नहीं थे

हिरास

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बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना बेबसी और लाचारी की लाठी हमें थमाए न बुढ़ापा आएना , बुढ़ापा आएना कभी नरम नरम कभी सख्त सख्त ये वक्त गुज़रता जाता है जाने अनजाने वो हथेली पर कुछ लिखता जाता है इन रेखाओं के चक्रव्यूह में हमको और फसाये न बुढ़ापा आएना, बुढ़ापा आएना मान किया न ध्यान दिया , कभी तुमने इस उपहार का कभी किश्तों का कभी रिश्तों का तुम्हे ध्यान था इस संसार का जो जन्मा है वो मिट के रहेगा , सबक तुम्हे सिखलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा कभी घुटनों में कभी टकनों में इस दर्द मरे का राग बुरा आलू गोभी में स्वाद नहीं लगता सरसों का साग बुरा छाती में कफ का घेरा है ये पल पल मुझे सताए न बुढ़ापा आये न ... बुढ़ापा आये न जब हरियाली भरे बाग़ में तेरे नाती पोते खेलेंगे तुझे छू छू कर भागेंगे तेरे हाथ से लाठी लेलेंगे अपने दिन तू भी याद करेगा देख उन्हें मुस्काएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा इन आती जाती साँसों की जब अवधि पूरी होएगी मन राम रमे , मुस्कान हो मुख पर दुनिया ओझल होएगी तब बदलेगा ये वस्त्र पुराना , वक्त तुझे नहलाएगा बुढ़ापा आयेगा, बुढ़ापा आयेगा ...