दराज़ में राखी चिट्ठी

वह चिट्ठी जो तुम्हारे नाम मैंने लिखकर दराज़ में रख संभाली है तुम्हारे बारे में क्या सोचती हूँ हर बात लिख डाली है कभी दूँगी तुम्हे पढ़ने के लिए या नहीं हाँ मगर तुम्हारे लिए मेरे मन में प्रेम कभी कम न होगा कुछ और बातें जोड़ती रहूंगी उस चिट्ठी में जो मैंने तुम्हारे नाम लिखकर रख संभाली है दराज़ में पढ़ लेना तुम , कभी मेरी आँखों में तो कभी मेरी मुस्कुराते हुए चेहरे पर

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