वह गुलाबी पतंग

 


खूब शोर तमाशा हुआ दिन भर 

छतों पर 

किसी की पतंग कट रही थी 

तो कोई औरों की  काट रहा था 

कोई मूंगफली की चिक्की खा रहा था 

तो कोइ तिल के लड्डू बाँट रहा था 


फिरकिओं से धागे कम हो रहे थे 

और पतंगों से दूरी बढ़ रही थी 

उसी पतंग से फिर भेंट हो

न हो- 

अपने मांझे को कसौटी की धार पर

आसमान - ए - जंग में 

सभी चढ़ा रहे थे 

दूसरों की पतंगों को निढाल होता देख 

ख़ुशी से चीख चिल्ला रहे थे 


बेशुमार पतंगें आसमान में 

इठला रही थीं 

फरफराती हुई मानो 

एक दुसरे से बतिया रही थीं 


दिन ढलने लगा 

पतंगें उतरने लगी 

उतरते उतरते जैसे 

बीते दिन की उड़ान को 

याद करने लगी 


रात हो चली 

मैं अपने कमरे की 

खिड़की पर बैठा 

चाय पीते हुए 

वही आसमान निहार रहा था 

कि एक पतंग की आह सुनाई दी 

पड़ोस की दीवार पर 

एक तार में फँसी 

गुलाबी पतंग दिखाई दी 

मैंने गौर से देखा 

उसकी चोंच की किनोर 

ज़ख़्मी थी और 

यह जगह जगह से फटी हुई 

वह पतंग अपने 

गुज़रे दिन की दास्ताँ 

कहती थी 

और 

एक पागल की तरह 

मैं देर तक उससे हाल पूछता रहा 

फड़फड़ाती हुई वह भी 

घंटों रोती रही 

अपने ख़ुशी के पल 

और डोर से कटने की बातें 

आंसुओं में पिरोती रही 

मैं निर्विकल्प बस उसे 

सुनता रहा 

फिर भी कुछ ही पल में 

हमारे बीच एक नाता सा 

बनता रहा 

वक्ता और श्रोता का 


रात भर उसके कराहने की 

आवाज़ आती रही 

बरसात जो हुई 

उसकी वह आवाज़ भी जाती रही 


सिकुड़ कर वह बेज़ुबान गुलाबी पतंग 

एक ढाँचे की तरह अब भी लटकी है 

कुछ ही दिनों में न जाने कौनसी याद 

मेरे ज़हन में आ भटकी है 


सैंकड़ों पतंगों में से एक यही पतंग 

मेरे जीवन से आ टकराई थी 

जिसने अपनी उड़ान और थकान 

मुझे आकर सुनाई थी 


कल फिर शोर तो बहुत होगा 

लेकिन वह गुलाबी पतंग 

फिर नहीं दिखाई देगी 

कौन याद करता है 

पतंग उड़ाने के बाद 

फट गई सो फट गई 

कट गई सो कट गई 


लेकिन 

ऐ गुलाबी पतंग !

मैं अपने पसीजे दिल में 

तुम्हें याद बनाकर रखूँगा 

दूर हो तो क्या हुआ 

एक फ़रियाद बनाकर रखूँगा 


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