संदेश

भीगे जज़्बात

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 वो पत्थर जो दिल ओ जान से प्यारा था  चूम कर एक दिन उसे नाम से पुकारा था  अपने अरमानों के ऊँचे शिखर से उस दिन  मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था  देखता रहा उसे जब तक न आँखों से वो ओझल होगया  मेरी आँखें नम थीं , और दिल बोझल होगया  न लौटेगा वो पत्थर कभी अब मेरे हाथों में  डूब कर रह गया था भीगे जज़्बातों में  मैंने अपने हाथों से लिखे खतों को  कतरा कतरा कर काटा था  अपनी आँखों के आगे उन्हें  टुकड़े टुकड़े कर बांटा था  खून मेरे हाथों का नहीं उन पर , उन ही एक दिल का था  मुझपर लगाया इलज़ाम उन्होंने कातिल का था खुद की तख़लीक़ खुद ही मिटा कर  खुश तो नहीं था मैं वो दाग हटा कर  तहरीर मेरी ज़िंदगी की इस कदर नाबूद होगी  क्या मालूम था फिर भी वो मेरी यादों में इस कदर  मौजूद होगी  जिस पत्थर को अपनी आँखों से कभी बुहारा था  मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था 

साँसों की सुत

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"जग जो जाना क्या जाना  जग के जीना सीख  जो जानेगा जोग को  हो साँसों की सुत ठीक"  - नितिन शर्मा (२५/०७/२०२२)
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गुण रहित, भाव सहित प्रेम जो किया करे वही सही मायने में राम रस पिया करे - नितिन शर्मा (२४/०७/२२)

भगवान् नहीं हूँ मैं

भगवान् नहीं हूँ मैं , भूल कर बैठता हूँ  विचारों के मंथन को , मुझ तक पहुँचते स्पंदन को  वर्जित कर न पाया, कभी कभी उठते इंसान को  क्योंकि मैं भगवान् नहीं हूँ,  भूल कर बैठता हूँ  १. लोगों से सुना करते हैं , संतुलन की बातें  न साधू ही तर पाए , न विकृत आत्मायें अब तक  जीवन को समझना मुश्किल ही सही मगर, मैं हार क्यों मानूं  मुझपर लगे विकारों, मल कलि कलेवरों को अपना श्रृंगार क्यों जानूं  २.  गिर-गिर के संभलना प्रकृति ने सिखाया है  संभल कर आगे बढ़ पाया , कभी जीवन सजाया है  बरसों लगे, पल पल इसे हमने तराशा पर  कभी खंडित , कभी दंडित होता हुआ नज़र आया है  ३.  मुझ तक ही लौटते हुए ये कर्म जो हैं मेरे  उजाले की लौ घर आते हुए , दूर करती तमस के घेरे  फिर उतरती आँगन के आँचल से धूप , शाम जो होती है  अच्छे-बुरे कर्मों की तुम्हारी किताब मेरे नाम को रोती है  ४.  पुष्प बन पाऊँ ये प्रयास है ईश्वर  कामयाबी की शरण मिल जाये कर करम  कोई रौंधना भी चाहे , अपनी नियति के तले  वह जो भी हो , जैसा भी हो भले...

आँखों देखा हाल

 छूट कर जब बादलों से बूँद धरती पर गिरी  घूँट मिट्टी ने जो पीया प्यास उसकी तब बुझी  बीज माली ने था बोया राहतें पाने लगा  एक नए संसार की वो चाहतें पाने लगा  देखते ही देखते बारात बूंदों की उठी  काले-काले बादलों से निचुड़कर गिरने लगी  ख़ुशी संभाले नदियाँ नाले पोखर सब भरने लगे  लत्ते भीगे पत्ते भीगे सबके दुःख हरने लगे  ----- (Jiska man dukhi hota hai .. use dukh ki bhasha samajh aati hai  jiska man praffullit hota hai boond uske saath vaisi baat karti hai  bheena bheena ---- emotions) तरतराती झरझराती पवन संग जब डोलती  बूँदें लहराती है भाषा नित नई ये बोलती  नृत्य करती जैसे कोई इठला रही नृत्यांगना  ऐसा भीना-भीना करती सभी का घर अँगना  सौंधी-सौंधी खुशबुएँ हैं सांस लो गहरी ज़रा  खुश हैं बादल रंग अब इनका भी लो धुलने लगा  जा रहा है देके खुशियां श्वेत वो बादल वहां  खिल रहा है पत्ता पत्ता झिलमिलाता आसमां  देखो देखो सूरज झांके बादलों की ओट से  चहचहाते पंछी निकले पेड़ों की नन्ही गोद से  फड़फड़ाते पंख...

दुकान

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दुकान सब चला रहे हैं   कोई भी आता-जाता तुम्हें माल दिखा जायेगा   खुद नहीं बेचोगे कुछ तो तुम्हे कोई भी ,  कुछ भी टिका जायेगा      नितिन शर्मा ( ०३/०७/२२ )  ---   If you do not wake up to your dreams, people are out there to sense that they will sell you their dreams and you will waste your life after something that you never dreamt of or wanted for yourself or your family, ever ; and you become the prey to predators around you.

ज़रूरी नहीं

 खुशकिस्मत होते हैं वो जिन्हें  हसरतों के ख़ज़ाने मिल जाते हैं  ज़रूरी नहीं हर किसी को  खुश रहने के बहाने मिल जाते हों  कभी कभी कदम तक  उठ नहीं पाते  उस अगले पत्थर की तरफ , जनाब ! ज़रूरी नहीं हर किसी को  हौंसला अफ़ज़ाई देने वाले अफ़साने मिल जाते हों  ऊंचे महलों में बैठे सेठों के मुख से  खुश रहने की हिदायत  सुनने में बहुत अच्छी लगती है  लेकिन फटे जुराब सिलाने के लिए  ज़रूरी नहीं हर जेब में चार आने मिल जाते हों  नितिन शर्मा (२७/०६/२२)