भीगे जज़्बात

 वो पत्थर जो दिल ओ जान से प्यारा था 
चूम कर एक दिन उसे नाम से पुकारा था 
अपने अरमानों के ऊँचे शिखर से उस दिन 
मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था 

देखता रहा उसे जब तक न आँखों से वो ओझल होगया 
मेरी आँखें नम थीं , और दिल बोझल होगया 
न लौटेगा वो पत्थर कभी अब मेरे हाथों में 
डूब कर रह गया था भीगे जज़्बातों में 

मैंने अपने हाथों से लिखे खतों को 
कतरा कतरा कर काटा था 
अपनी आँखों के आगे उन्हें 
टुकड़े टुकड़े कर बांटा था 
खून मेरे हाथों का नहीं उन पर , उन ही एक दिल का था 
मुझपर लगाया इलज़ाम उन्होंने कातिल का था

खुद की तख़लीक़ खुद ही मिटा कर 
खुश तो नहीं था मैं वो दाग हटा कर 
तहरीर मेरी ज़िंदगी की इस कदर नाबूद होगी 
क्या मालूम था फिर भी वो मेरी यादों में इस कदर  मौजूद होगी 

जिस पत्थर को अपनी आँखों से कभी बुहारा था 
मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था 

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