भगवान् नहीं हूँ मैं

भगवान् नहीं हूँ मैं , भूल कर बैठता हूँ 
विचारों के मंथन को , मुझ तक पहुँचते स्पंदन को 
वर्जित कर न पाया, कभी कभी उठते इंसान को 
क्योंकि मैं भगवान् नहीं हूँ,  भूल कर बैठता हूँ 

१. लोगों से सुना करते हैं , संतुलन की बातें 
न साधू ही तर पाए , न विकृत आत्मायें अब तक 
जीवन को समझना मुश्किल ही सही मगर, मैं हार क्यों मानूं 
मुझपर लगे विकारों, मल कलि कलेवरों को अपना श्रृंगार क्यों जानूं 

२. 
गिर-गिर के संभलना प्रकृति ने सिखाया है 
संभल कर आगे बढ़ पाया , कभी जीवन सजाया है 
बरसों लगे, पल पल इसे हमने तराशा पर 
कभी खंडित , कभी दंडित होता हुआ नज़र आया है 

३. 
मुझ तक ही लौटते हुए ये कर्म जो हैं मेरे 
उजाले की लौ घर आते हुए , दूर करती तमस के घेरे 
फिर उतरती आँगन के आँचल से धूप , शाम जो होती है 
अच्छे-बुरे कर्मों की तुम्हारी किताब मेरे नाम को रोती है 

४. 
पुष्प बन पाऊँ ये प्रयास है ईश्वर 
कामयाबी की शरण मिल जाये कर करम 
कोई रौंधना भी चाहे , अपनी नियति के तले 
वह जो भी हो , जैसा भी हो भले 
खुशबु उसके जीवन में फैला आऊं 

फिर भी , मैं भगवान् तो नहीं , भूल कर ही बैठता हूँ 

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