सच्चे रिश्ते
रिश्ते जो पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं अपने सपनों की सीढ़ी पर आपको आगे बढ़ाते हैं अपनी हथेली की रेखाओं को आपकी किस्मत बनाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं बरसों बरस बातों के बीज तक नहीं पड़ते न विचारों के सूरज की किरणे उतरती मन आँगन अचानक एक दिन बूँद पटल पर आकर गिरी है फिर वही तरीन ठहाकों की गूँज जो सुनाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं माँ पुकारती नहीं और माँ स्वार्थी नहीं माँ अपने बच्चों को विस्तृत होता देखती है उन्हें संसार के मंच पर पुरस्कृत होता देखती है माँ के अपने अरमान बच्चों को पास नहीं बुलाते हैं ऐसे सच्चे रिश्ते, पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं पिता का ह्रदय चट्टान सा महान होता है अपने बच्चों के लिए वही जीवन की पहचान होता है अपने बच्चों को परीक्षित होकर गिरता उठता हुआ देखता है पिता अपने सपनो की आहुति बच्चों के जीवन-यज्ञ में चढ़ाते हैं नहीं ! ऐसे सच्चे रिश्ते पलट कर एहसान नहीं गिनाते हैं