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जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं

 जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं  मैं हूँ वो जो कभी मुस्कुराया नहीं  ये मुकद्दर मेरा , थक गया हूँ प्रभु  वक्त मुझको तेरे दर पे लाया यहीं  तेरी आवाज़ यूँ तो मैं सुनता रहा  बात तेरी कभी मैंने मानी नहीं  कीर्तन और भजन दूर की बात है  पीर मैंने पराये की जानी नहीं  कर्म कहते किसे , धर्म होता है क्या  मैंने खुद को कभी समझाया नहीं  तुझसे माँगा जनम मैंने पाया प्रभु  ये परिवार उपहार सब हैं दिए  करता सक्षम मुझे दाता हर हाल तू  मुझको अपनी हथेली पे फिरता लिए  किये एहसान इतने हर एक मोड़ पर  क़र्ज़ जन्मों जन्म भर पाया नहीं  तूने पाया मुझे कभी रोता हुआ  कभी खोया था मैं माया के मोह में  मैं मलिन ही रहा काम और क्रोध से  तूने फिर भी गले से लगाया मुझे  भगवन थामे रहना तू मुझको यूँही  हर पल ध्यान रहे मुझे तेरा यहीं  जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं  मैं हूँ वो जो कभी मुस्कुराया न

शुक्रिया

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  हर शाम का शुक्रिया कि दिया  वो सब जिसका हक़दार मैं रहा  हर सुबह लायी है अवसर नया  नयी आशाएं लिए तुमसे कह रहा  कह रहा कि ये मित्र , ये प्राकृतिक इत्र  ये छुअन ये आर्द्रता ये हवा ये सबा  ये एहसास ज़िन्दगी का तुम्हारे लिए है  सुनो , कुछ बुनो , कुछ बनो कुछ बनाओ  चख लो ये नीर पलों का , ये झरना..  तुम्हारे लिए ही बह  रहा है  नितिन - २९ / ०६ / २३ 

ओह यह मोह !

यह काठ की मेज़ का उपहार ? मुझे मेरी बुआ ने  बारहवें जन्मदिन पर दिया था  और यह लोहे का बड़ा गिलास  जो माँ मेरे लिए मेले से लाइ थी  इसमें , गर्मियों की छुट्टियों में  आम का रस  खूब पिया था  वो जंग लगा बक्सा जिसे तुम  कबाड़ी में देने की सोच हो बेटे  वो मेरे पिताजी की आखरी निशानी है  ये सब पुरानी चीज़ें तुम मेरे बाद  फ़ेंक तो दोगे मगर तुम्हें एक बात बतानी है  इनके साथ जुड़े हुए जज़्बात  मेरी उम्र बढ़ा  रहें हैं  इन बूढी आँखों को  झूठा ही सही एक हंसती खेलती ज़िंदगी का दिलासा दिला रहे हैं  इन ही में मैं अपने खोये हुए  रिश्तों  को याद कर लेता हूँ  खड़ा खड़ा कभी अकेले ही  अपने चेहरे पर मुस्कान पाता हूँ  अगले ही पल हकीकत की दस्तक सुन  लौट आता हूँ  ये मोह, अब मेरे इस शरीर के अंग हैं बेटा  जो मेरे बाद भुला दिए जायेंगे  लेकिन सच तो ये है  कि ये बंधन अब  मेरे साथ ही जायेंगे  - नितिन शर्मा 

कटी पतंग

 कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी टूटा दिल लिए आज जो मुरझाई सी बैठी है वो भी कभी फूलों सी खिलखिलाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी जब मस्ती में लहराती हंसती मुस्कुराती सी अचानक पराये मांझे से उलझी होगी दिल धक् से रह गया होगा रोइ होगी चिल्लाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी देखी हैं इसने भी शौहरत अपने मालिक की आँखों में खुद के लिए शाबाशियां सुनी हैं इसने अपने कानों में क्या हुआ की अब सब लुटा के बैठी है , मगर इसके लिए भी कोई कहानी तो ऊपर वाले ने बनाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी

दुकानें चलती रहें

नाम क्या है क्या है कनुबा  क्या करता परिवार चलाने को  क्या है ज़रुरत अगले की  ये सारी , जानकारी  अपनी गठरी में भरकर  उसकी आँखों में झांको  फिर फांको  उसके जेब की गिन्नी  एक एक अठन्नी  जब मन भर जाये  फिर सूँघो उसके मन की  और किस कोने में  बचे हैं अगले के अरमान  घोंप दो उसके सीने में  जो छुरी छुपाई है  पीठ सहारे तुमने  ध्यान रहे वो मरने न पाए न चीख ही निकले  उसे मालूम भी न हो  कि छुरी उसके आर पार है  अब तुम्हारे हाथों उसका  सारा संसार है  तुम चैन से सोते रहो  और वो जागने न पाए तुम्हारे जकड से  कहीं भी वो भागने न पाए   बस, यही दोहराना है  हमें अपना पेट भरना है  खुद का परिवार चलाना है  दुकानें चलती रहें यूँ ही  इंसानियत मरती रहे यूँ ही    

साथ चलते रहना

  जब तक है मोम मेरे साथ जलते रहना और फिर अगली मोम तक मेरे साथ चलते रहना बाती नई, साथी वही सदा जिसकी हर पल बुलाती रही तुम ही तो हो मेरे साथ गिरते-संभलते रहना मेरे साथ चलते रहना - नितिन शर्मा ०७.०१.२३

भीगे जज़्बात

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 वो पत्थर जो दिल ओ जान से प्यारा था  चूम कर एक दिन उसे नाम से पुकारा था  अपने अरमानों के ऊँचे शिखर से उस दिन  मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था  देखता रहा उसे जब तक न आँखों से वो ओझल होगया  मेरी आँखें नम थीं , और दिल बोझल होगया  न लौटेगा वो पत्थर कभी अब मेरे हाथों में  डूब कर रह गया था भीगे जज़्बातों में  मैंने अपने हाथों से लिखे खतों को  कतरा कतरा कर काटा था  अपनी आँखों के आगे उन्हें  टुकड़े टुकड़े कर बांटा था  खून मेरे हाथों का नहीं उन पर , उन ही एक दिल का था  मुझपर लगाया इलज़ाम उन्होंने कातिल का था खुद की तख़लीक़ खुद ही मिटा कर  खुश तो नहीं था मैं वो दाग हटा कर  तहरीर मेरी ज़िंदगी की इस कदर नाबूद होगी  क्या मालूम था फिर भी वो मेरी यादों में इस कदर  मौजूद होगी  जिस पत्थर को अपनी आँखों से कभी बुहारा था  मैंने इन ही हाथों से उसे गहरी खाई में उतारा था