ओह यह मोह !

यह काठ की मेज़ का उपहार ?

मुझे मेरी बुआ ने 

बारहवें जन्मदिन पर दिया था 

और यह लोहे का बड़ा गिलास 

जो माँ मेरे लिए मेले से लाइ थी 

इसमें , गर्मियों की छुट्टियों में 

आम का रस 

खूब पिया था 

वो जंग लगा बक्सा जिसे तुम 

कबाड़ी में देने की सोच हो बेटे 

वो मेरे पिताजी की आखरी निशानी है 

ये सब पुरानी चीज़ें तुम मेरे बाद 

फ़ेंक तो दोगे

मगर तुम्हें एक बात बतानी है 

इनके साथ जुड़े हुए जज़्बात 

मेरी उम्र बढ़ा  रहें हैं 

इन बूढी आँखों को 

झूठा ही सही

एक हंसती खेलती ज़िंदगी का दिलासा दिला रहे हैं 

इन ही में मैं अपने खोये हुए  रिश्तों  को याद कर लेता हूँ 

खड़ा खड़ा कभी अकेले ही 

अपने चेहरे पर मुस्कान पाता हूँ 

अगले ही पल हकीकत की दस्तक सुन 

लौट आता हूँ 

ये मोह, अब मेरे इस शरीर के अंग हैं बेटा 

जो मेरे बाद भुला दिए जायेंगे 

लेकिन सच तो ये है 

कि ये बंधन अब  मेरे साथ ही जायेंगे 


- नितिन शर्मा 



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