संदेश

समय रहते

लड़ते भिड़ते , कुढ़ते चिढ़ते   उम्र बीतने लगती है   क्यूँ कर रूठे बैठे अहम की आग जीतने लगती है   किस कारण , आँखें फेर रहे   जब सोच जागने लगती है   तब देर बहुत हो जाती है   जब रूह भाग निकलती है   ना आँखें देख पाती फिर उनको ना कहने को लफ़्ज़ मिल पाएँगे   तुम भी हो मेहमान यहाँ   जिनसे रूठे हो , वे भी जाएँगे   मान जाओ या मना लो उनको   जो पास हैं फिर भी मीलों दूर   कह लो सुन लो मन की अपनी   ढहती मिट्टी क्यूँ मगरूर   नितिन शर्मा  

कर्म और पुनर्जन्म

ना किसी और का हक़   दरिंदों की भाँति छीनते फिरो   यूँ ना हो कि अगले जनम में   कचरे के ढेर से खाना बीनते फिरो  

माँ

" धनी हुँ मैं तु जो साथ है   तेरे मेरे बीच ये जज़्बात हैं   तुझसे शुरू होती मेरी हर बात है   माँ तु ही मेरा दिन मेरी रात है "

Lockdown

स्पर्श दोस्त का भूल रहा हुँ   श्वेत सपन - सा झूल रहा हुँ   देगी कब यारी द्वारे दस्तक   इंतज़ार यह आख़िर कब तक   नानी के घर जाना होता   सबसे मिलना मिलाना होता   गर्मी की छुट्टी कैसी ये आयी   अपने ही घर में बैठें कब तक   इंतज़ार यह आख़िर कब तक   खेल खिलौने कब तक खेलें   इंटर्नेट विज्ञापन झेलें   खबरों में क्या झूठा क्या सच्चा   किसकी मानें कौन है रक्षक   इंतज़ार यह आख़िर कब तक   कभी ये गहरी धूंद छटेगी   आँखों से यह छटा हटेगी   सब नया - नया नज़ारा होगा   आएगा याद जो देखा अब तक   पर इंतज़ार ये आख़िर कब तक   © नितिन शर्मा  

वफ़ाएँ याद करोगे

दिन दिन बढ़ता प्रेम , आसमां छूने लगा था   बनाया था ले ले कर मोहब्बत की गुहार   तुम्हारे लिए   तुम्हारे दिल में सर्द हवाएँ ही करवटें लेती होंगी   कि ना दिख पाया मेरी आँखों का प्यार   तुम्हारे लिए   © नितिन शर्मा  

बच्चे

बन बालक बोल बचन   मन सुंदर मीठे कथन   निश्छल निर्मल निर्विकार   सुनयना सपने सदैव साकार   © नितिन शर्मा  

हमदम

समाया है मेरे हमदम   तेरा हर लफ़्ज़ आहों में   तेरा हर स्पर्श तेरी बातें   बसती हैं यूँ साँसों में   कि जैसे बात हो कल की   कि जैसे साथ ही हो तुम   तेरी यादों में जीता हुँ   हो तुम मेरी पनाहों में   समाया है मेरे हमदम   तेरा हर लफ़्ज़ आहों में   © नितिन शर्मा