मृग तृष्णा
भगवान नहीं हूँ मैं, भूल कर बैठता हूँ
विचारों के मंथन को, मुझ तक पहुँचते स्पंदन को
वर्जित कर न पाया, कभी कभी उठते इंसान को, क्यूँकि
मैं भगवान नहीं हूँ ...
औरों से सुना करते थे, संतुलन की बातें
न साधु ही तर पाए, न विकृत आत्माएँ अब तक
जीवन को समझना कठिन ही सही
सभी प्रयत्नशील हैं यहाँ - कोई 'है'
जो कभी तो सुनेगा इस मानवीय क्रंदन को
क्यूँकि मैं भगवान नहीं हूँ....
गिर गिर के सम्भलना प्रकृति ने सिखाया है
संभल कर आगे बढ़ पाया, कभी जीवन सजाया है
बरसों लगे पल पल, इसे हमने तराशा मगर
कभी खंडित, कभी दंडित होता हुआ नज़र आया है
क्यूँकि मैं भगवान नहीं हूँ...
मुझ तक ही फिर कर आते हुए ये जो कर्म हैं मेरे
उजाले की लौ घर आते हुए, दूर करती तमस के घेरे
फिर उतरती आँगन के आँचल से, धूप, शाम जो होती है
अच्छे बुरे कर्मों की, तुम्हारी किताब, मेरे नाम को रोती है
क्यूँकि मैं भगवान नहीं हूँ...
पुष्प बन पाऊँ, ये प्रयास है ईश्वर, मेरी महक सदूर जाए
शब्द मधुर गीत बन कर गूँजें, किसी का जीवन सजायें
बन बन मैं बन कर घूमा हूँ , शून्य, तेरी खोज में, अब रोज़ निहारा करता हूँ
आँकड़ों के गणित को, सच, की तलाश थी, लिए सच को अपने साथ
कहा भगवान नहीं हूँ मैं - क्या सच, मैं भगवान नहीं हूँ ?

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