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संभव है

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उम्र नहीं हो

उम्र नहीं हो   लिबास नहीं   न वज़न तुम अपनी देह का   न रंग अपने बालों का   न गालों पर पड़ते गड्ढे हो  तुम न पहचान किसी के नेह का   वो किताबें जो तुम पढ़ते हो   जो शब्द ज़बान से गढ़ते हो   आवाज़ सुबह की अलसाई सी   मुस्कान चेहरे पर पिघलाई सी   वो हँसी के ठहाके कभी कभी   और वो आंसू की सिसक दबी दबी   कभी गीत जो खुले दिल गाते हो   या मन ही मन तुम बाजे बजाते हो   वो जगह जहाँ खुश रहते हो   वो लोग जिन्हें घर कहते हो   तुम्हारा विश्वास जिन चीज़ों में ज़ब्त है   और तुम्हारी चाहत जिन लोगों में सशक्त है   वो तस्वीरें जो तुम्हारे बैडरूम में टंगी हैं   तुम आस हो अपने भविष्य की   जिस पर तुम्हारे आखें लगी हैं  इतनी सुंदरता तुम्हारे भीतर है   फिर क्यों चिंता  क्यों इतनी फ़िकर है   न करो परिभाषित जीवन को   उन चीज़ों से ,  उन लोगों से   जो नहीं मिल पाए सींचन को  ...

अस्पताल की सीढ़ियां

 जीवित हैं जब तक स्वस्थ रहें मुस्कुराएं  ईश्वर किसीको अस्पताल की सीढ़ियां न चढ़ाये  उलझन तड़पन दर्द अनेकों  चीख पुकारें जहाँ भी देखो  भागम भाग है सुर्ख लाल सी  सरकती ज़िंदगी पड़ी आलसी  ऐसा समय किसी का ना आये। ..  ये न पीना वो न खाना  आते जाते नर्स रोकती  चंद मिनिट भी सोना मुश्किल  सुइयां  तरह तरह की भोंकती  ऐसी पीड़ा किसी को ना आये। ...  आवाज़ें होती मद्धम जैसे  शरीर में जैसे जान नहीं हों  लेकिन ये दर्द एहसास कराता  जैसे दुख की पहचान यही हो  ऐसी वेदना किसी को न पहुचाये। ..  वे भयावह दृश्य अब उस पार हैं सारे  स्वस्थ शरीर में अलग दीखते नज़ारे  ये भगवन हम तेरी माया से हारे  यही प्रार्थना सांझ सकारे  सभी स्वस्थ रहें , कभी दुःख न पाएं  तू किसी को भी अस्पताल की सीढ़ियां न चढ़ाये 

जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं

 जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं  मैं हूँ वो जो कभी मुस्कुराया नहीं  ये मुकद्दर मेरा , थक गया हूँ प्रभु  वक्त मुझको तेरे दर पे लाया यहीं  तेरी आवाज़ यूँ तो मैं सुनता रहा  बात तेरी कभी मैंने मानी नहीं  कीर्तन और भजन दूर की बात है  पीर मैंने पराये की जानी नहीं  कर्म कहते किसे , धर्म होता है क्या  मैंने खुद को कभी समझाया नहीं  तुझसे माँगा जनम मैंने पाया प्रभु  ये परिवार उपहार सब हैं दिए  करता सक्षम मुझे दाता हर हाल तू  मुझको अपनी हथेली पे फिरता लिए  किये एहसान इतने हर एक मोड़ पर  क़र्ज़ जन्मों जन्म भर पाया नहीं  तूने पाया मुझे कभी रोता हुआ  कभी खोया था मैं माया के मोह में  मैं मलिन ही रहा काम और क्रोध से  तूने फिर भी गले से लगाया मुझे  भगवन थामे रहना तू मुझको यूँही  हर पल ध्यान रहे मुझे तेरा यहीं  जिसने नाम तेरा कभी गाया नहीं  मैं हूँ वो जो कभी मुस्कुराया न

शुक्रिया

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  हर शाम का शुक्रिया कि दिया  वो सब जिसका हक़दार मैं रहा  हर सुबह लायी है अवसर नया  नयी आशाएं लिए तुमसे कह रहा  कह रहा कि ये मित्र , ये प्राकृतिक इत्र  ये छुअन ये आर्द्रता ये हवा ये सबा  ये एहसास ज़िन्दगी का तुम्हारे लिए है  सुनो , कुछ बुनो , कुछ बनो कुछ बनाओ  चख लो ये नीर पलों का , ये झरना..  तुम्हारे लिए ही बह  रहा है  नितिन - २९ / ०६ / २३ 

ओह यह मोह !

यह काठ की मेज़ का उपहार ? मुझे मेरी बुआ ने  बारहवें जन्मदिन पर दिया था  और यह लोहे का बड़ा गिलास  जो माँ मेरे लिए मेले से लाइ थी  इसमें , गर्मियों की छुट्टियों में  आम का रस  खूब पिया था  वो जंग लगा बक्सा जिसे तुम  कबाड़ी में देने की सोच हो बेटे  वो मेरे पिताजी की आखरी निशानी है  ये सब पुरानी चीज़ें तुम मेरे बाद  फ़ेंक तो दोगे मगर तुम्हें एक बात बतानी है  इनके साथ जुड़े हुए जज़्बात  मेरी उम्र बढ़ा  रहें हैं  इन बूढी आँखों को  झूठा ही सही एक हंसती खेलती ज़िंदगी का दिलासा दिला रहे हैं  इन ही में मैं अपने खोये हुए  रिश्तों  को याद कर लेता हूँ  खड़ा खड़ा कभी अकेले ही  अपने चेहरे पर मुस्कान पाता हूँ  अगले ही पल हकीकत की दस्तक सुन  लौट आता हूँ  ये मोह, अब मेरे इस शरीर के अंग हैं बेटा  जो मेरे बाद भुला दिए जायेंगे  लेकिन सच तो ये है  कि ये बंधन अब  मेरे साथ ही जायेंगे  - नितिन शर्मा 

कटी पतंग

 कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी टूटा दिल लिए आज जो मुरझाई सी बैठी है वो भी कभी फूलों सी खिलखिलाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी जब मस्ती में लहराती हंसती मुस्कुराती सी अचानक पराये मांझे से उलझी होगी दिल धक् से रह गया होगा रोइ होगी चिल्लाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी देखी हैं इसने भी शौहरत अपने मालिक की आँखों में खुद के लिए शाबाशियां सुनी हैं इसने अपने कानों में क्या हुआ की अब सब लुटा के बैठी है , मगर इसके लिए भी कोई कहानी तो ऊपर वाले ने बनाई होगी कटी पतंग अगर किसी शाख पर अटकी दिखे अगले ही पल कोई अवधारणा न बना लेना आसमानों की ऊंचाइयां छूकर आई होगी कितनों के दिल गद गद कर बादलों में लहराई होगी