उम्र नहीं हो
उम्र नहीं हो
लिबास नहीं
न वज़न तुम अपनी देह का
न रंग अपने बालों का
न गालों पर पड़ते गड्ढे हो
तुम
न पहचान किसी के नेह का
वो किताबें जो तुम पढ़ते हो
जो शब्द ज़बान से गढ़ते हो
आवाज़ सुबह की अलसाई सी
मुस्कान चेहरे पर पिघलाई सी
वो हँसी के ठहाके कभी कभी
और वो आंसू की सिसक दबी दबी
कभी गीत जो खुले दिल गाते हो
या मन ही मन तुम बाजे बजाते हो
वो जगह जहाँ खुश रहते हो
वो लोग जिन्हें घर कहते हो
तुम्हारा विश्वास जिन चीज़ों में ज़ब्त है
और तुम्हारी चाहत जिन लोगों में सशक्त है
वो तस्वीरें जो तुम्हारे बैडरूम में टंगी हैं
तुम आस हो अपने भविष्य की
जिस पर तुम्हारे आखें लगी हैं
इतनी सुंदरता तुम्हारे भीतर है
फिर क्यों चिंता
क्यों इतनी फ़िकर है
न करो परिभाषित जीवन को
उन चीज़ों से ,
उन लोगों से
जो नहीं मिल पाए सींचन को
सुंदर हो तुम
सुंदर हो तुम
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