न पाप हैं न पुण्य हैं
न पाप हैं न पुण्य हैं
विचार जैसे शून्य हैं
गदर नहीं फिकर नहीं
डगर नहीं शहर नहीं
कहां से कब चला था मैं
कहां हूं अब खबर नहीं
मीलों दूर जन्म से
या पास हूं मैं मौत के
घेरते हैं क्यों मुझे
ये साये गहरे खौफ के
भार है शरीर का
मैं कांपता अधीर सा
हूं मैं भी जैसे मैं नहीं
आरंभ यह प्रलय नहीं
कैसे देखूं कुछ यहां
मैं हो रहा विलय यहीं
हवा में यूं लहरा रहा
रो रहा कराह रहा
न कोई मांग अब मेरी
न चित्त कुछ भी चाह रहा
यहां भी मैं वहां भी मैं
हूं कौन मैं न जानता
नदी हूं क्या जो बह रहा
डर रहा हूं कह रहा
खो रहा पहचान अब
खुद से भी अंजान अब
बन रहा बिगड़ रहा
मोड़ और मरोड़ सा
रौशनी की चौंध है
मुझ से जो निकल रही
है स्मृति मेरे ही जन्म की
उगल रही निगल रही
न पाप हैं न पुण्य है
विचार जैसे शून्य हैं
नितिन (११.०३.२४)
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